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अब आगे क्या ?- सवाल हर भारतीय युवा का

चुनावी आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले रोजगार के बड़े बड़े सपने दिखाए जाते हैं।  विभिन्न पदों के लिए आवेदन मंगवा लिए जाते हैं।  विद्यार्थी सोचता है शायद अब वो नौकरी पा लेगा। पर चुनाव हो जाने के बाद ना जाने ये आवेदन कहाँ खो जाते हैं!

बारहवीं क्लास पास होते ही हम स्टूडेंट्स निकल पड़ते हैं अपने सपनों को पूरे करने के दौड़ में।  देश के प्रतिष्ठित कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में प्रवेश पाकर हम सोचतें हैं कि हम अपने सपने पूरे करने के एक कदम और करीब पहुंच गए हैं।आँखों में हज़ारों सपने और दिल में कुछ कर दिखने के जोश के साथ निकल पड़ते हैं अपने घरों से दूर। माता-पिता भी अपने बच्चों के सपने पूरे करने के लिए सबकुछ करतें हैं। पैसों की कमी और सीमित संसाधनों के बावजूद भी किसी तरह स्टूडेंट अपना कोर्स पूरा करता है। लेकिन कोर्स पूरा करते ही, डिग्री मिलने से पहले ही, एक यक्ष-प्रश्न उसके सामने आ खड़ा होता है,”अब आगे क्या?” यह प्रश्न का सामना वो बार-बार करता है और ये उसे तोड़ कर और झकझोर कर रख देता है।  इस प्रश्न का उसके पास कोई जवाब नहीं होता।

आखिर ऐसी स्थिति क्यों!

जैसा की माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा भारतीय शिक्षा व्यवस्था आज केवल मार्क्स और मार्कशीट आधारित बन चुकी है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का उद्देश्य मात्र डिग्री देना रह गया है। अधिकांश विश्वविद्यालयों का ध्यान केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित रह गया है। कोरोना वायरस के इस समय में ये बात और प्रत्यक्ष रूप से सामने आया जब बिना पढ़ाये ही परीक्षा लेने पर सभी विश्वविद्यालय उत्सुक दिखे। ऐसी स्थिति में विद्यार्थियों का सर्वांग विकास नहीं हो पाता और वो रोजगार प्राप्त करने के लायक ही नहीं बचते। कई संस्थानों द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट्स बताते हैं की अधिकांश भारतीय विद्यार्थी रोजगार प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं क्योंकि उनमें स्किल और सम्बंधित ज्ञान की कमी है।

जब विद्यार्थी डिग्री लेकर बेरोजगार निकलता है और “अब आगे क्या?” का प्रश्न उसके सामने उठता है तो वो विभिन्न सरकारी नौकरियों की तैयारी करने का निर्णय लेता है। इन विद्यार्थियों का उद्देश्य अब एस. एस. सी., बैंकिंग, रेलवे जैसे सरकारी विभागों में नौकरी प्राप्त करके आत्मनिर्भर  बनना हो जाता है।  तैयारी करने के लिए ये विद्यार्थी पहुंच जाते हैं दिल्ली, प्रयागराज, पटना इत्यादि शहरों में ताकि अच्छी कोचिंग प्राप्त कर सकें। लेकिन यहाँ भी दुर्भाग्य इनका पीछा कहा छोड़ता। नौकरियों के ये पद भी अब चुनावी स्ट्रेटेजी का हिस्सा बन चुका है साहब। ये पद भी तभी निकलते है जब चुनाव आने वाला होता है।

चुनावी आचार संहिता लागू होने से ठीक पहले रोजगार के बड़े बड़े सपने दिखाए जाते हैं। विभिन्न पदों के लिए आवेदन मंगवा लिए जाते हैं।  विद्यार्थी सोचता है शायद अब वो नौकरी पा लेगा। पर चुनाव हो जाने के बाद ना जाने ये आवेदन कहाँ खो जाते हैं! सरकारें अन्य कार्यों में इतनी व्यस्त हो जाती है की इन पदों और आवेदनों के बारे में शायद भूल जाती है। विद्यार्थी फॉर्म भरने के बाद एग्जाम के लिए दो-दो साल तक प्रतीक्षा करते रहते है। हाल ही में ऐसी स्थिति रेलवे के ओर से कुछ वर्ष पूर्व जारी किए पदों के सन्दर्भ में देखा गया।

दो साल के इन्तजार करने पर भी इन पदों के परीक्षा विषय में विद्यार्थियों को कोई जानकारी ना दी गई तो उनका गुस्सा फूट पड़ा। ट्विटर ट्रेंड और अन्य माध्यमों से जब छात्रों ने आंदोलन शुरू किया तो विभाग को आनन-फानन में परीक्षा दिसंबर में करवाने की सूचना देनी पड़ी।  पद आता है तो परीक्षा का प्रवेश-पत्र नहीं आता, परीक्षा होता है तो समय पर परिणाम घोषित नहीं होता, परिणाम घोषित होता है तो उसमे कई प्रकार के विवाद सामने आ जाते हैं और महीनों-सालों तक ये विवाद कोर्ट इत्यादि के चक्कर में फसा रहता है।

इस सब चक्करों में विद्यार्थी पिस के रह जाता है और दिल्ली, पटना जैसे शहरों के छोटे से कमरे में बैठ कर अपने भाग्य को कोसता रहता है।  इन सब के कारण कई प्रयास में भी उसे सफलता नहीं मिलती तो अपने सपनों को झोले में बाँध चल पड़ता है वापस अपने घरों की ओर जहाँ वो चंद रुपयों की नौकरी करके अपना जीवन गुजार देता है। इतनी मेहनत और संघर्ष के बावजूद उसे समाज बार-बार यही पूछ के प्रताड़ित करता है,”आखिर इसने इतना पढ़ लिख के किया ही क्या?

अब आगे क्या ?

बेरोजगारी सुरसा के मुख के तरह बढ़ती ही जा रही है। सबको रोजगार देना एक जटिल विषय जान पड़ता है। लेकिन इस स्थिति में बदलाव लाना होगा। सरकारों को रोजगार उपलब्ध करवाने के प्रति गंभीर, पारदर्शी और जवाबदेह होना होगा।  सरकारी नौकरियों में लेट-लतीफी और अनियमितता को दूर करना होगा। स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों को स्किल-बेस्ड और रोजगार आधारित शिक्षा के ओर अग्रसर होना होगा। नई शिक्षा नीति 2020 इस ओर एक उम्मीद की किरण के रूप में दिखाई पड़ती है।  विद्यार्थियों को नई संभावनाओं को तलाशना होगा और खुद को लगातार बेहतर बनाने के प्रयास में लगना होगा। कहते है की उम्मीद पे दुनिया कायम है। बस उम्मीद के साथ आगे बढ़ना होगा। लेकिन अपना आवाज भी बुलंद करते रहना होगा। अपने मांगों को लेकर डटे रहना होगा और सचेत रहना होगा की हमारे अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा। बदलाव आएगा और ये बदलाव हम युवाओं से ही आएगा।

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Written by Kunal Jha

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