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ऑनलाइन क्लासेज : रोहतक फ़िल्म संसथान के छात्रों का भविष्य संकट में

समस्याओं का समाधान करने के बजाये, एडमिन स्टूडेंट्स की कमर तोड़ने की कोशिश कर रहा है। वह फीस थोप रहा है साथ ही कॉलेज से टर्मिनेट कर देने की धमकी भी दे रहा है। एडमिन छात्रों को निजी तौर पर टारगेट करने की कोशिश कर रहा हैं। आगामी 31 तारिख फ़ीस भरने की अंतिम तिथि हैं लेकिन स्टूडेंट्स ने फ़ीस न भर, अपने अधिकारों के लिए खड़े रहने और लड़ते रहने का फैसला लिया हैं।

फ़र्ज़ करें कि कल सरकार कहे कि किसान को ऑनलाइन खेती करनी हैं। अपने कमरे में बैठें और अपने खेतों में वीडियो कॉल के माध्यम से खेती करें,  या फिर, किसी लोको पायलट को यह कहा जाए कि वीडियो कॉल करें और ट्रैन चला लें, तो क्या यह संभव हैं? विकास चाहे बुलेट ट्रैन की रफ़्तार से भी तेज़ भाग लें लेकिन ऑनलाइन तो वो प्रधान मंत्री का मनपसंद भोजन पकोड़ा भी नहीं बेच सकता। विकास को पकोड़ा बेचने के लिए, सड़क पर दुकान लगाकर, पकोड़े तल, बेचना पड़ेगा।

घबराइए मत, सरकार ने अब तक यह फैसला नहीं किया हैं कि ऑनलाइन खेती या ट्रैन चलाया जाएगा लेकिन यह ज़रूर कहा हैं कि ऑनलाइन पढाई करें।

छाती पीटने के लिए और विदेशों में नाम कमाने के लिए ऑनलाइन पढाई सुनने में बहुत अच्छा लगेगा लेकिन ज़मीनी हकिक़त देखें तो छवि दिल दहला देने वाली हैं।  पोस्टरों में गरीब बच्चे को मोबाइल से पढाई करते देख, आप और हम खुश हो सकते हैं लेकिन वो गरीब बच्चा खुश हैं के नहीं यह जानना मुश्किल हैं। आंकड़ों की बात करें तो गूगल सर्च दूर आपको पता लग जाएगा कि देश में इंटरनेट की सुविधा का उपभोग कर पाने वाले लोग पूरी आबादी का 35% भी नहीं है और उसमे से उनका हिस्सा काट दें जो एक ऑनलाइन क्लास में आकर “हैल्लो .. मेरी आवाज़ अब तक पहुँच पा रही है? हैल्लो! हैल्लो!” ही करते रहते हैं। तो फिर हम छाती किस बात की पीटें? हम से मेरा मतलब “छात्रों” से हैं, वो तो किसी भी बात की छाती पीट लेते हैं, अब छाती ही 56 इंच चौड़ी जो हैं।

एक बार मान भी लें कि देश में सब चंगा हैं और इंटरनेट कनेक्शन सभी छात्रों के पास हैं तब भी देश की कुछ यूनिवर्सिटी ऐसी भी हैं जहाँ थ्योरी क्लास का हिस्सा प्रैक्टिकल के मुकाबले बहुत कम हैं। अगर आप करियर की बात पर सिर्फ इंजीनियर समझते हैं तो आपको यह समझाना ज़रूरी हैं कि देश में ऐसे संसथान हैं जहाँ फिल्म-मेकिंग जैसे विषय भी हैं फिर भले ही  छात्रों की पढ़ाई के बाद नौकरी ना लगे। वैसे मंदी के इस के इस दौर में इंजीनियर ही कितने महफूज़ हैं!

रोहतक स्तिथ फिल्म संस्थान के छात्र पिछले कुछ दिनों से अपनी मांगों को लेकर एडमिन से बात करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन एडमिन का शायद नेटवर्क बेहद बिजी हैं।

मार्च महीने में क्लासेज़ बंद होने के बाद से स्टूडेंट्स अपने घरों में बैठे हैं। इस बीच स्टूडेंट् ने उस सेमेस्टर की बची क्लासेज़ और प्रोजेक्ट्स को लेकर संपर्क साधने की कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। UGC की गाइडलाइन्स फॉलो करते हुए यूनिवर्सिटी ने थर्ड ईयर के स्टूडेंट्स के सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट “फिक्शन फिल्म और स्टूडियो फिल्म” को काट दिया।

यहां तक कि फर्स्ट ईयर और सेकंड ईयर के भी फाइनल सेमेस्टर प्रोजेक्ट्स कॉन्टिन्यूटी प्रोजेक्ट और DV प्रोजेक्ट काट दिए गए। हद तो यह है कि प्रोजेक्ट्स काटकर उनकी जगह कोई अन्य प्रोजेक्ट्स को कराने का कोई आश्वासन ना देते हुए यूनिवर्सिटी ने रिज़ल्ट निकाल दिया और स्टूडेंट्स को अगले सेमेस्टर पहुंचा दिया।

मोटे तौर पर समझें तो मार्च के बाद ना तो पढ़ाई हुई, ना प्रोजेक्ट्स हुए, ना प्रैक्टिकल्स हुए, ना इनके लिए कोई आश्वासन मिला। स्टूडेंट्स बिना उन विषयों को पढ़े और समझे अगले सेमेस्टर में प्रमोट हो गए। जिन विषयों की ज़रूरत अगले सत्र में पड़ने वाली है।

रिज़ल्ट आने के बाद एक नोटिस आता है, जिसमें अगले सत्र की फीस देने की बात की जाती है। स्टूडेंट्स एडमिन से संपर्क साधने की कोशिश करते हैं लेकिन जवाब में नया नोटिस आता है, जिसमें फीस के साथ फाइन भरने की धमकी मिलती है।

छात्रों की मांगें –

  • प्रोजेक्ट्स और प्रैक्टिकल्स का लिखित आश्वासन:

फिल्म बनाने की कला कॉपी-पेन में लिखकर परीक्षा देने की कला नहीं है। फिल्म मेकिंग सीखने के लिए फील्ड पर उतरना पड़ता है। फिल्म इंस्टिट्यूट से पहले भी फिल्में देश-विदेश के फेस्टिवल्स में नाम कमा चुकी हैं। इसलिए स्टूडेंट्स चाहते हैं कि वे भी फिल्म बनाना सीखें, उसकी बारीकियों को समझें। ताकि देश का नाम रौशन करें लेकिन एडमिन स्टूडेंट्स के प्रोजेक्ट्स काट रहा है। स्टूडेंट्स को पूर्णतः आश्वासन नहीं मिल रहा है कि कोरोना काल के बाद जब भी सब कुछ पटरी पर लौटने लगेगा उनके प्रोजेक्ट्स उन्ही नॉर्म्स के अंतर्गत कराए जाएंगे, जो पहले से निर्धारित हैं। प्रशासन अभी प्रोजेक्ट्स को लेकर साफ तौर पर कुछ नहीं कह रहा है। स्टूडेंट्स की मांग है कि जब भी स्थिति ठीक हो उनके प्रोजेक्ट्स हों।

  • ऑनलाइन क्लासेज़:

इन विषयों के सिलेबस का 10 से 20 प्रतिशत हिस्सा ही थ्योरी होता है। थ्योरी में भी प्रोजेक्टर के माध्यम से फिल्में दिखाई जाती हैं। स्टूडेंट्स को थ्योरी क्लासेज़ ऑनलाइन लेने में दिक्कत नहीं होती है। ऐसे बहुत बहुत सारे ऐसे स्टूडेंट्स हैं, जो दूर-दराज़ गाँव से आते हैं और वहां इंटरनेट उतनी तेज़ रफ्तार में काम नहीं करता कि वे ऑनलाइन प्रोफेसर की बातें समझ पाएं।

 

एक स्टूडेंट जम्मू कश्मीर से हैं, जहां अब भी 2G चल रहा है। कुछ स्टूडेंट्स के पास खुद का मोबाइल फोन नहीं है। सबसे ज़रूरी बात जब फैकल्टी से पूछा गया कि आप किस तरह से ऑनलाइन क्लास को प्लान कर रहे हैं, तो उनसे कोई जवाब नहीं मिला। स्टूडेंट अब भी उस मेल का इंतज़ार कर रहे हैं, जिसमें फैकल्टी उन्हें यह समझाएंगे कि वो ऑनलाइन क्लास किस तरह से कंडक्ट करने वाले हैं।

इन सभी समस्याओं के चलते स्टूडेंट्स ने मिलकर फीस ना देने का निर्णय लिया है। स्टूडेंट्स तब तक इस निर्णय पर टिके रहेंगे, जब तक ऊपर लिखी तीनों समस्याओं का समाधान नहीं हो जाता है। समस्याओं का समाधान करने के बजाये, एडमिन स्टूडेंट्स की कमर तोड़ने की कोशिश कर रहा है। वह फीस थोप रहा है साथ ही कॉलेज से टर्मिनेट कर देने की धमकी भी दे रहा है। एडमिन छात्रों को निजी तौर पर टारगेट करने की कोशिश कर रहा हैं। आगामी 31 तारिख फ़ीस भरने की अंतिम तिथि हैं लेकिन स्टूडेंट्स ने फ़ीस न भर, अपने अधिकारों के लिए खड़े रहने और लड़ते रहने का फैसला लिया हैं।p

रोहतक फिल्म संस्थान का हड़ताल से पुराना नाता हैं। पिछले स्ट्राइक में 21 छात्रों पर एडमिन ने FIR और कोर्ट केस कर दिया था। तहकीकात में पता चला कि रजिस्ट्रार झूठी थी और छात्रों को अपने हित के लिए फंसाया था।

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