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ऑनलाइन वेबीनार – भारत में गर्भपात कानून: मार्जिन समुदाय के दृष्टिकोण से

खुद के शरीर पर सबसे ज्यादा अधिकार सिर्फ महिला का ही होता है। फिर ऐसे में उसे बच्चा रखना है या नहीं रखना है इसका फैसला लेने का सबसे अधिक हक केवल महिला को ही है।

हाल ही में जारी किए गए एमटीपी संशोधन अधिनियम 2020 को लेकर 20 जुलाई 2020 को एक ऑनलाइन वेबीनार का आयोजन किया गया। यह वेबीनार शाम 4:00 बजे से लेकर 5:30 बजे तक चला इस वेबीनार में मुख्य वक्ता डॉक्टर अक्सा शेख जो दिल्ली स्थित एक मेडिकल एजुकेटर है। वह जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय, दिल्ली में सामुदायिक चिकित्सा विशेषज्ञ हैं। अक्सा खुद एक ट्रांसवुमन हैं और भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के सामने आने वाली चुनौतियों पर विस्तार से लिखती हैं। इनके साथ ही श्याम और किरण तथा तेजस्विनी भी इस वेबीनार में शामिल थी । वकीरम ने एक मध्यस्थ के रूप में इस वेबीनार को संभाला। यह वेबीनार मुख्यतः औरतों और ट्रांसजेंडर समुदाय की महिलाओं के गर्भधारण करने या गर्भपात कराने के अधिकारों को समझने के लिए था।

एमटीपी संशोधन अधिनियम 2020 में ऐसे अनेक पहलू दिखाई पड़ते हैं जिनको लेकर लोगों के मन में सवाल खड़े होते हैं। इन्हीं सवालों का हल ढूंढने के लिए इस वेबीनार का आयोजन किया गया। सबसे पहले डॉ अक्सा शेख ने बताया की खुद के शरीर पर सबसे ज्यादा अधिकार सिर्फ महिला का ही होता है। फिर ऐसे में उसे बच्चा रखना है या नहीं रखना है इसका फैसला लेने का सबसे अधिक हक केवल महिला को ही है। गर्भावस्था को मेडिकल सहायता से समाप्त करने के फैसले को आजकल एक समस्या के रूप में देखा जा रहा है। इसी वजह से इसको लेकर कानून बनाए जा रहे हैं। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए हमें इस चीज को काफी साधारण तरीके से देखना चाहिए।

डॉ शेख ने बताया कि मेडिकल नियम के अनुसार जब भी किसी मरीज का इलाज किया जाता है तो सभी से परामर्श किया जाता है। सबसे पहले मरीज के घरवाले, सभी डॉक्टर और मरीज आपस में मिलकर विचार विमर्श करते हैं और उसके बाद ही मरीज का इलाज करते हैं। मगर जब कोई महिला गर्भपात के लिए अस्पताल जाती है तो उसे उसके अधिकारों को नहीं समझाया जाता। उनसे एक कागज पर हस्ताक्षर करवा लिए जाते हैं और ना ही उसे उस कागज पर क्या लिखा है यह बताया जाता है।

इसके बाद डॉ. अक्सा शेख ने बताया की गर्भपात दो तरीकों से किया जा सकता है। एक मेडिकल तरीके से जिसमें दो गोलियां लेनी होती हैं। यह तरीका केवल गर्भधारण के 9 हफ्तों के अंदर ही प्रयोग किया जा सकता है। इसके बाद दूसरा तरीका है सर्जिकल अर्थात जिसमें डॉ. गर्भपात करवाते हैं । यह तरीका केवल 20 से 24 हफ्तों के अंदर ही प्रयोग किया जा सकता है। 

इसके बाद अक्सा बताती हैं कि जब कोई शादीशुदा महिला अगर बात कराने के लिए अस्पताल जाती है तो उनसे उनके साथी का नाम पूछा जाता है और उनके बारे में जानकारी ली जाती हैं। ऐसे में भारत में अनेक महिलाएं ऐसे हैं जो सेक्स वर्कर के रूप में कार्य करती हैं तो उनके क्लाइंट भी उनके साथी के रूप में है जाने जाने चाहिए। और केवल एक महिला ही गर्भधारण नहीं कर सकती ऐसी अनेक ट्रांसजेंडर भी हैं जो गर्भ धारण कर सकते हैं। तो ऐसे में इन कानूनों से महिला शब्द को हटाते हुए एक गर्भवती इंसान या इससे कुछ मिलता जुलता शब्द जोड़ना चाहिए। 

इसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए श्याम बताते हैं कि किसी भी बिल का विरोध करने से पहले हमें इस बात का पता लगाना चाहिए कि यह बिल किस आधार पर बनाया जा रहा है। और बिल बनाने वाले लोग कौन हैं। किसने उन्हें यह हक दिया कि वह एक महिला के शरीर के अंगों के बारे में या उसकी इच्छाओं को नकारते हुए उसके शरीर के बारे में कानून बनाएं। महिलाओं के आप भी अपना एक स्वाभिमान है उनके कुछ अधिकार हैं। जो इन कानूनों के नीचे दब जाएंगे। श्याम बताते हैं कि किसी भी कानून के बनने का सिर्फ एक ही अर्थ होना चाहिए कि उससे दूसरों को मदद मिले ना कि उनके अधिकारों का हनन हो। किसी भी दूसरी महिला के शरीर या उससे जुड़े किसी भी अंग के लिए किसी दूसरे को कानून बनाने का कोई हक नहीं है।

इसके साथ ही श्याम ने बताया कि आज का भारतीय समाज इतना नीचे गिर गया है कि एक औरत के चरित्र का हिसाब वह उसके अंगों के आकार से लगाता है । इसके बाद उन्हें बताया की लॉकडाउन में लोगों को लग रहा है कि वह सब एक जगह बंध गए हैं। लेकिन ट्रांसजेंडर समुदाय तो सदियों से ही लॉकडाउन में है। उन्हें कभी खुलकर सामने आने का मौका मिला ही नहीं है।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए किरण जो स्वयं एक सेक्स वर्कर हैं, ने बताया की गर्भपात की समस्या उनके समुदाय में कितनी बड़ी है। उन्होंने बताया कि आज के समय में जब हमारे समुदाय की महिलाएं 99% कंडोम या अन्य गर्भ निरोधक का इस्तेमाल करती हैं। मगर इसके बावजूद भी यदि कोई महिला गर्भवती होती है और वह गर्भपात कराना चाहती है तो अस्पताल वाले उसे दूसरों से अलग नजरिए से देखते हैं। उन्होंने बताया कि अक्सर डॉक्टर उन्हें टालते रहते हैं और फिर एक ऐसा समय आता है कि वह उनको गर्भपात करने के लिए मना कर देते हैं। ऐसे में वह महिला कहीं से दवाइयों का इंतजाम करती है और उन दवाइयों को खाकर अपनी जान को खतरे में डालती है। क्योंकि उनके पास इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं होता है। उन्होंने इस एमटीपी संशोधन अधिनियम 2020 के इस नियम की एक महिला को गर्भपात कराने से पहले कोर्ट से अनुमति लेनी होगी पर काफी गुस्सा जताया और कहा यदि एक महिला को इस विषय को लेकर कोर्ट से अनुमति लेनी पड़ेगी तो हर व्यक्ति चाहे वह ट्रांसजेंडर समुदाय से हो या कोई महिला हो या कोई अन्य पुरुष सभी को सेक्स करने से पहले भी कोर्ट से अनुमति लेनी चाहिए। 

किरण जी की बात को आगे बढ़ाते हुए तेजस्वी जी बताती हैं कि सेक्स वर्क और अपराध का आपस में एक गहरा रिश्ता है। उन्होंने बताया कि जो गर्भपात मेडिकल या दवाइयां लेकर किया जाता है वह एक काफी गंभीर खतरा है। लेकिन सेक्स वर्कर या ट्रांसजेंडर समुदाय की महिलाएं सर्जिकल गर्भपात कराने में असमर्थ रहती हैं। क्योंकि इसके लिए उन्हें अपने जरूरी डाक्यूमेंट्स जैसे आधार कार्ड राशन कार्ड या कोई अन्य पहचान पत्र देना होता है। मगर यह सब या तो परिवार द्वारा निकाले जाते हैं या जबरदस्ती काम में लगाए जाते हैं । ऐसे में यह अपनी पहचान बदल लेते हैं और कई बार इनके पास आवश्यक पहचान पत्र नहीं होते।

वकिरम ने इस विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा की जब भी महिला या उनके जीवन से संबंधित किसी भी विषय पर कोई भी कानून बनाया जाता है तो उस समय महिलाओं के सम्मान या स्वाभिमान के बारे में नहीं सोचा जाता। ऐसा लगता है कि एक ट्रांस जेंडर या अन्य महिला होने के नाते खुद की पहचान किसी के समक्ष रखने का हक हमसे ज्यादा कानून के पास है। सरकार कभी भी हमारे समुदाय से नहीं पूछती कि हमें क्या चाहिए। क्योंकि उन्हें लगता है कि वह हमसे बेहतर जानते हैं कि हमें क्या चाहिए।

डाॅ. अक्सा और और तेजस्वी जी ने इस विषय को सीएए के साथ जोड़ते हुए बताया कि यह पूरी तरह से कागजों पर आधारित है। ट्रांसजेंडर या सेक्स वर्कर के पास उनके कागज नहीं है। इस वजह से इन समुदायों को अत्यधिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि बिना पहचान पत्र या कागजों के इनका कोई अस्तित्व ही नहीं माना जा रहा। 

अंत में डॉक्टर अक्सा ने कुछ श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए गर्भधारण की आयु तथा उससे जुड़े पोक्सो कानून का भी जिक्र किया और समझाया कि किस तरह अलग-अलग उम्र में धारण किए जाने वाले गर्भ को लेकर अलग-अलग तरह के कानून बने हुए हैं। इन कानूनों का गर्भवती महिला उसके परिवार तथा गर्भपात करने वाले डॉक्टरों पर क्या असर होता है इन सभी का जिक्र किया गया।

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