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चुनाव आयोग  के नाम तीस्ता सेतलवाड़ का खुला पत्र – प्रवासियों की जिंदगी भी रखती है मायने

इस लेख में व्यक्त विचार सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस की ओर से भारतीय निर्वाचन आयोग को भेजे गए सामूहिक ज्ञापन से जुड़े हैं. आयोग को यह ज्ञापन 10 जुलाई 2019 को भेजा गया था.

“आम नागरिक और  लोकतांत्रिक शासन की सफलता में अपार विश्वास की बदौलत ही इस असेंबली ने व्यस्त मताधिकार के सिद्धांत को अपनाया है. इस सभा का इस बात में पूरा विश्वास है कि व्यस्त मताधिकार के जरिये एक लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना से देश में जागरूकता और बेहतरी और बेहतरी आएगी.लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा.देश का आदमी एक गरिमामय और सुकून भरी जिंदगी जी सकेगा”

अलाड़ कृष्णस्वामी अय्यर

अमेरिका में सबको वोट देने का अधिकार मिलने में लंबा वक्त लग गया था.यहां यह अधिकार लोगों को धीरे-धीरे दिया गया.लेकिन भारत में आजादी के साथ ही हर नागरिक वोट देने का हकदार हो गया.भारत में अगर 15 फ़ीसदी के बजाए सारे व्यस्क नागरिकों को वोट देने का अधिकार हासिल हुआ तो इसके पीछे समानता और भेदभाव विरोधी आदर्शों से प्रेरित हमारा आजादी का आंदोलन था.

सभी भारतीयों को वोट देने के अधिकार के मामले में डॉ बी.आर. अंबेडकर की सोच साफ थी. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 में डॉ. अंबेडकर की यही दृष्टि प्रतिबिंबित हुई है. इस अनुच्छेद में न सिर्फ सभी को मताधिकार के आधार पर चुनाव कराने की व्यवस्था है, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया गया है कि संपत्ति जैसी संभ्रांत सुविधा के आधार पर यह अधिकार सिर्फ समाज के कुछ उत्कृष्ट लोगों तक सीमित न रह जाए. हर नागरिक को मताधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार होगा.

इस मामले में होने वाले सार्वजनिक विमर्शों को अंबेडकर ने दशकों तक  प्रभावित किया था. 1919 में साउथबोरो कमेटी के सामने प्रमाण देते हुए (यह कमेटी उस समय इंडियन डोमिनियन का प्रतिनिधित्व करने वाले संस्थानों का स्वरूप तय करने के लिए प्रमाणों का रिकार्ड कर रही थी) अंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक सरकार का और मताधिकार का चोली-दामन का साथ है, इन्हें अलग नहीं किया जा सकता है. मताधिकार ही राजनीतिक शिक्षा का अग्रदूत (मुख्य अग्रदूतों में से एक) साबित होगा.

आज जब 21वीं सदी में पूरा भारत कोविड-19 की वजह से लागू लॉकडाउन से जूझ रहा है, तो देश के लिए अपनी इस समृद्ध विरासत को याद करना जरूरी है. दरअसल देश की नीतियों और सरकार चलाने वाली पार्टियों के चुनाव में जनता की मंशा झलकती है. इसके जरिए ही वह अपने प्रतिनिधि चुनती है. यह वोट ही प्रतिनिधित्व के आधार पर खड़े इस लोकतंत्र की बुनियाद का प्रतीक है.

आज जिस प्रकार हमारे आधुनिक और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया पर अबाध पैसों, जाति, वर्ग और सामुदायिक हितों जैसे अभिशाप हावी हैं, ऐसे में क्या भारत अपने गिरेबान में झांक कर यह बता सकता है, कि क्यों सिर्फ काम के लिए अपने घरों से दूर रहने वाली आबादी के एक बड़े हिस्से को उसके मौलिक संवैधानिक अधिकार से महरूम रखा जा रहा है?

देश की नजर शायद पहली बार प्रवासी मजदूरों की ओर गई है.अचानक लगाए गए लाकडाउन से इस देश की एक बड़ी आबादी को त्रासदियों का सामना करना पड़ा. ये त्रासदियां राजनीतिक नेताओं समेत इस देश के ज्यादा सुविधा संपन्न लोगों की आंखों के सामने थी.भारतीय लोकतंत्र अगर इस त्रासदी से सही सबक सीखना चाहता है, तो उसे घरों से दूर काम करने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए वोट का अधिकार सुनिश्चित करना होगा.ये लोग अपने इस अधिकार का इस्तेमाल कर सके और उस की पुख्ता व्यवस्था करनी होगी.वे अपने हित में विधानसभाओं, सांसद और पार्टियों का चुनाव कर सकें इसलिए उन्हें यह अधिकार देना ही होगा.इसके जरिए वे सामाजिक परिवर्तन के लिए तैयार होंगेऔर इसके वाहक बन सकेंगे.

इस मुहिम को आगे बढ़ाने की जरूरत है.भारतीय संविधान अपने हर नागरिक को देश के किसी हिस्से में आने-जाने और रहने का अधिकार देता है.यह लोगों को बेहतर जीविका और रोजगार के मौके तलाशने के लिए किसी भी हिस्से में जाने की इजाजत देता है. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में आंतरिक प्रवासियों की तादाद 45 करोड़ थी.उस समय तक 2001 की तुलना में इसमें 45 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हो चुका था. इसमें से 26 फ़ीसदी यानी 11.7 करोड़ लोग अपने ही राज्य में एक जिले से दूसरे जिले के बीच आने जाने वाले थे.12 फीसदी यानी 5.4 करोड़ प्रवासी एक राज्य से दूसरे राज्य में गए थे.अधिकारिक और स्वतंत्र विशेषज्ञों दोनों का मानना है कि यह आंकड़ा कम है. एक बड़ी आबादी उन प्रवासियों की होती है, जो किसी दूसरे राज्य या जिले में जाकर बहुत दिनों तक नहीं टिकते. वो अपने गृह नगर या जिलों के बीच फेरा लगाते रहते हैं. ऐसे प्रवासियों की संख्या ही 6 से 6.5 करोड़ लोगों की हो सकती है.इनमें इनके परिवार के सदस्यों को शामिल किया जाए तो यह संख्या 10 करोड़ हो जाती है.इनमें से आधे अंतरराज्यीय प्रवासी हैं.

अध्ययनों से यह जाहिर हो चुका है कि प्रवासी मजदूर सबसे कमजोर वर्ग के भारतीयों में शामिल है.यह सबसे ग़रीब इलाकों से आते हैं.यह समाज के हाशिए वाले कगार पर पड़े लोग होते हैं. (इनमें से अधिकतर अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, मुस्लिम समेत अन्य अल्पसंख्यक वर्ग के लोग हैं). यह शिक्षा से वंचित और संपत्ति जमीन के मालिकाना हक से वंचित लोगों का समूह होता है.

2011 में सबसे ज्यादा लोग यूपी और बिहार से दूसरे राज्यों में जा रहे थे. इनकी संख्या क्रमशः 83 और 63 लाख थी. सबसे ज्यादा लोग महाराष्ट्र और दिल्ली जा रहे थे.बाद में इन प्रवासियों की तादाद में झारखंड पश्चिम बंगाल और ओडिशा के प्रवासी भी शामिल हो गए. यह प्रवासी मजदूर अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक सेक्टरों में काम करते हैं.

ज्यादातर प्रवासी मजदूरों के पास अपने गृह क्षेत्र का बना हुआ वोटर कार्ड होता है. 2012 की एक स्टडी के दौरान जिन प्रवासियों के बीच सर्वे किया गया था, उनमें से 78 फीसद इनके पास अपने गृह नगरों के बनाए गए वोटर आईडी कार्ड थे. वोटर लिस्ट में भी वे अपने क्षेत्र के मतदाता के तर्ज पर ही मौजूद थे.

आर्थिक मजबूरियां प्रवासियों को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए अपने गृह राज्य नहीं जाने देती. काम के कड़े घंटे और सीजन से, वे एक दिन में अपने घर पहुंच कर अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान एक सर्वे में जिन लोगों से सवाल पूछे गए थे उनमें से सिर्फ 48 दिन है वोट दिए थे, कि राष्ट्रीय औसत 59.7 फ़ीसदी था. उस चुनाव में केवल सिर्फ 31 फ़ीसदी लोगों ने वोट दिए थे. यह ढर्रा लगातार चला आ रहा है. 2019 लोकसभा चुनाव में बिहार, यूपी जैसे सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूर वाले राज्यों में वोटिंग सबसे कम रही थी. बिहार और यूपी में क्रमशः 57.33 और 59.21 फ़ीसदी वोटिंग हुई. जबकि राष्ट्रीय औसत 67.4 फ़ीसदी रही.

इसके अलावा गृह राज्य और दूसरे राज्यों के बीच लगातार आवाजाही (सर्कुलर माइग्रेशन) की वजह से स्थाई और लंबे वक्त तक एक राज्य में न रह पाने वाले मजदूर, जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 20 के तहत साधारण नागरिक (“ordinary residents “) का दर्जा हासिल नहीं कर पाते हैं, और वहां के वोटर आईडी कार्ड से महरूम हो जाते हैं.इस तरह से वे उन क्षेत्रों में वोट नहीं डाल पाते ,जहां काम कर रहे होते हैं.उन शहरों में काम करने वाले मजदूरों में सिर्फ 10 फ़ीसदी के पास ही वहां के वोटर आईडी कार्ड थे.

इंटर-स्टेट माइग्रेशन वर्क मैन एक्टर 1979(“ISMW”) प्रवासी मजदूरों के को शोषण से बचाने के लिए लाया गया था. इस एक्ट के मुताबिक केंद्र और राज्यों के लिए प्रवासियों मजदूरों की ओर से किए जाने वाले काम का रिकार्ड रखना जरूरी है. इस डेटा को बिल्कुल सही तरीके से रखा जाना चाहिए ताकि भारत का चुनाव आयोग यहां से ये आंकड़े ले सके.

भारतीय निर्वाचन आयोग, संविधान के अनुच्छेद के तहत गठित एक संवैधानिक संस्था है. जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 60 (सी) के तहत उसे यह अधिकार है वह कुछ खास वर्गों को पोस्टल बैलट (डाक मतपत्र) के जरिए वोट डालने का अधिकार दे सकें. चुनाव आयोग का मिशन है कि कोई भी ‘वोटर छूटना नहीं चाहिए’. इसलिए डाक के जरिए वोट डालने की सुविधा दी गई है. 2019 के चुनाव में 28 लाख से ज्यादा वोट पोस्टल बैलेट के जरिए हासिल हुए. लिहाजा भारत के प्रवासी मजदूरों को भी डाक के जरिए वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने मताधिकार की व्याख्या की है. सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के मुताबिक मताधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार का विस्तार है.

इसलिए भारतीय निर्वाचन आयोग का दायित्व बनता है कि इस आजादी के इस्तेमाल के लिए ज्यादा से ज्यादा माकूल हालात तैयार करें. इसलिए हर धर्म, लिंग, जातीयता या विश्वास से परे हर प्रवासी मजदूर के इस मौलिक अधिकार के इस्तेमाल की व्यवस्था सुनिश्चित करें. यह भारतीय निर्वाचन आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है.

अगर “भारतीयों के इस वर्ग” (प्रवासी मजदूरों) के मताधिकार की वैधानिक इस्तेमाल के इंतजाम नहीं किए जाते हैं तो यह माना जाएगा कि इस देश का पूरा राजनीतिक विमर्श  (इसमें सत्ता और विपक्ष दोनों के लोग शामिल हैं) ऐसे लोगों की सुरक्षा, गरिमा और बेहतरी की अनदेखी कर रहा है.

‘अछूतों’ के मताधिकार को लेकर अंबेडकर की जो दृष्टि थी, उस पर गौर करना जरूरी है. उन्होंने कहा था कि “नागरिकता दो चीजों से बनती है.पहला प्रतिनिधित्व के अधिकारों से और दूसरा राज्य के अधीन पद हासिल करने के अधिकार से. इन्हीं दो अधिकारों से नागरिकता का लक्ष्य हासिल होता है.”

भारत के लिए यह बेहतर होगा कि वह डॉ अंबेडकर के इस विचार को जमीनी स्तर पर लागू करें. इस देश में लंबे समय से अदृश्य रही आबादी का एक बड़ा हिस्सा (प्रवासी मजदूर) की राजनीतिक शिक्षा तभी पूरी हो पाएगी ऐसे कदम इस देश को और बेहतर बनाएंगे.

अप्रवासी की जिंदगी में मायने रखती हैं इसे समझना जरूरी है.

(इस लेख में व्यक्त विचार सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस ( cjp.org.in ) की ओर से भारतीय निर्वाचन आयोग को भेजे गए सामूहिक ज्ञापन से जुड़े हैं. आयोग को यह ज्ञापन 10 जुलाई 2019 को भेजा गया था इस पर लोक शक्ति अभियान, ओडीशा, ऑल इंडिया यूनियन ऑफ फॉरेस्ट वर्किंग पीपुल्स,(AIUFWP) ,बांग्ला संस्कृति और भारतीय नागरिक अधिकार सुरक्षा मंच असम के हस्ताक्षर हैं.)

(इस लेख के लिए संचिता कदम, राधिका गोयल और शर्वरी  कोठवाड़े ने रिसर्च की है तीनों वकील है.)

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