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किसानों की समस्याओं पर राजनीति

हमारी राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं को किसानों की समस्या नहीं दिखाई दे रही हैं। बल्कि उनके लिए यह एक अवसर है जिसका फायदा उठाकर ये आने वाले चुनावों में जीत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

किसान हमारे देश के लिए  मानव शरीर की रीढ़ की हड्डी की तरह है। इसके बिना देश का स्वस्थ विकास और प्रगति संभव नहीं है। लेकिन आज समस्या यह है कि यह रीढ़  (हमारे किसान) कई समस्याओं से पीड़ित है। सभी कठिनाइयों के बावजूद जिनका वे रोज सामना करते हैं,  वे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमारे किसानों ने हमें कभी निराश नहीं किया। वे बढ़ती आबादी की मांग को पूरा करने में सक्षम हैं। किसान रोजगार के लिए किसी अन्य स्रोत पर निर्भर नहीं हैं। वे स्वयं कार्यरत हैं और दूसरों के लिए रोजगार भी पैदा करते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में किसानों का योगदान लगभग 17% है। उसके बाद भी वे गरीबी का जीवन जीते रहे।

किसानों की इस खराब हालत के लिए हमारी व्यवस्था में फैला भ्रष्टाचार , मौसम की मार, नकली बीजों और दवाइयों का व्यापार जिम्मेदार है। किंतु इन सभी में प्रमुख है भ्रष्टाचार। तभी तो जरूरतमंद किसानों को सरकारी योजनाओं का उचित लाभ नहीं मिल पाता है।सरकारों की योजनाओं में भी तमाम खामियां होती हैं, जिनके चलते किसानों को सड़कों पर उतरना पड़ता है। देश के विकास के दावे खोखले साबित हो रहे हैं, क्योंकि बुनियादी समस्याएं ही हल नहीं हो रही हैं। कृषि के हालात बिगड़ गए हैं और उसकी विकास दर गिरने से गांवों के किसानों की स्थिति दयनीय हो गई है। अधिकतर किसानों के लिए घर चलाना तक भी मुश्किल हो गया और वे आत्महत्या के रास्ते को अपनाने लगें हैं।

एनसीआरबी द्वारा 21 अक्टूबर 2019 जारी रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में 11,379 किसानों और खेतिहर मजूदरों ने खुदकुशी की थी। यह आंकड़ा एनसीआरबी ने अपनी रिपोर्ट एक्सिडेंटल डेथ एंड सुसाइड 2016 नाम से जारी किया था। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर महीने 948 किसान, यानि हर दिन 31 किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

इससे पहले 2015 में जो रिपोर्ट आई थी उसके मुताबिक 12,602 किसान और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की थी, जबकि 2014 में 12,360 किसानों और मज़दूरों ने कृषि संकट के चलते आत्महत्या की थी। इससे पहले 2012 में 13,754 और 2013 में 11,772 किसान और कृषि से जुड़े मजदूरों ने आत्महत्या की थी।

हाल ही में देश का किसान अपनी समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतरा था।इस बार वजह वो तीन अध्यादेश हैं जो मोदी सरकार द्वारा पास किए गए हैं और अब संसद में बिल के रूप में पेश कर दिए गए। संसद में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने ये तीनों बिल पेश किए थे। अब सरकार की तैयारी इन तीनों बिलों को पास कराने की है। दूसरी तरफ देश के कई इलाकों में किसान इनके विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं । कृषि क्षेत्र से जुड़े ये तीन बिल हैं-

  1. कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल,
  2. आवश्यक वस्तु (संशोधन) बिल, मूल्य आश्वासन तथा
  3. कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता बिल

किसानों द्वारा सरकार के इन फैसलों का विरोध तब से ही किया जा रहा है जब से अध्यादेश पास किए गए। किसानों और किसान संगठनों सभी का यही कहना है कि ये नये तथाकथित कृषि सुधार लागू होने से किसान और उसकी उपज पर प्राइवेट कंपनियों का कब्जा हो जाएगा और सारा फायदा बड़ी कंपनियों को मिलेगा। परिणामस्वरूप किसान एक बार फिर धोखे और गरीबी का शिकार बन जायेगा।

किंतु न तो बीते सालों में किसी ने किसानों, खेतिहर मज़दूरों और जमीदारों के हित के लिए सोचा और न ही इनके उत्थान के बारे में। योजनाएं बनाई गई और लागू भी की गई, लेकिन उनमें से अधिकतर सिर्फ कागजों पर ही रहीं या केवल भ्रष्ट अधिकारियों की जेबों तक। इनका लाभ कभी पूर्णतः हमारे किसानों को मिल ही नहीं पाया। क्योंकि यदि ऐसा होता तो आज हमारे देश का किसान कर्ज में न डूबा होता और आत्महत्या के आंकड़ें इतने अधिक न बढ़ते।

लेकिन हमारे देश में हमारे अन्नदाता की समस्याओं और उनकी जान से भी अधिक महत्वपूर्ण फिल्म जगत तथा अभिनेताओं/अभिनेत्रियों की जिंदगी से जुड़े मुद्दे हैं। हमारा युवा आज सोशल मीडिया पर इन्हीं सब बातों में उलझ कर रह गया है। यहाँ तक की हमारी मीडिया ने भी किसानों के मुद्दे से ज्यादा अहमियत इन मुद्दों को दी। ऐसे में किसान किस से आस लगाए और कैसे अपने लिए न्याय की गुहार लगाए। इसके बावजूद भी जब किसान अपने हक़ की मांग रखने के लिए सड़कों पर उतरा तो उन पर लाठियां बरसाई गयी और उन्हें वहां से भगा दिया गया।

किंतु हमारी राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं को किसानों की समस्या नहीं दिखाई दे रही हैं। बल्कि उनके लिए यह एक अवसर है जिसका फायदा उठाकर ये आने वाले चुनावों में जीत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी  तथा अन्य अनेक दलों ने जोर शोर से इस विरोध का समर्थन किया और जमकर भाजपा दल को और सरकार को दोषी ठहराया। किंतु इसका अर्थ यह नहीं है की यह पार्टी किसानों के समर्थन में है। यह तो बस जलती आग में अपनी अपनी रोटियां सेंक रहे हैं।

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