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मैनुअल स्कैवेंजिंग और स्वच्छ भारत अभियान की हकीकत

देश के कई हिस्सों में यह परम्परा जारी है। भारत के अधिकांश गांवों में सीवरेज नहीं होने के कारण घरों से गंदा पानी निकलने की कोई प्रणाली नहीं है। ऐसे शौचालय भी नहीं, जहां मल निकास की व्यवस्था हो।

मैला ढोने की प्रथा

भारत देश को आजाद हुए 72 साल से ज्यादा समय बीत चुका हैं। इस दौरान भारत ने उत्तरोत्तर प्रगति की है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। परन्तु सिर पर मैला उठाने की परम्परा आज भी जारी है। आखिर यह परम्परा कब समाप्त होगी यह मामला समझ से परे है। कहने को केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा देश भर में सिर पर मैला ढोने की प्रथा समाप्त करने के लिए ढेर सारे जतन किए गये हों, पर कागजी बातों और वास्तविकता में जमीन आसमान का अन्तर दिखाई पड़ रहा है।

आम तौर पर मैनुअल स्कैवेंजिंग सुरक्षा उपकरणों के उपयोग के बिना सीवरों की सफाई या शौचालयों से कचरे को हटाने का कार्य है।साधारण शब्दों में, अनुपचारित मानव मल को हाथ से बाल्टी या फावड़े का उपयोग करके गड्ढे वाले शौचालय या बाल्टी शौचालय से हटा दिया जाता है अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा परिभाषित मैला ढोने के तीन रूप हैं,सेप्टिक टैंकों की सफाई, सूखे शौचालयों और गटर और सीवर की सफाई से मानव मल को हटाना।

ये लोग एक बोरी और एक हैंडल के साथ एक बाल्टी को बुनियादी उपकरणों के रूप में उपयोग करते हैं।तब कर्मचारी कचरे को मैन्युअल रूप से उठाता है और निपटान स्थलों पर ले जाता है।मैनुअल स्कैवेंजिंग को अमानवीय और कानून का उल्लंघन माना जाता है।यह स्वास्थ्य और व्यवसाय, मानव अधिकारों और सामाजिक न्याय, लिंग और जाति और मानव गरिमा के प्रभुत्व को समाहित करता है।

यह प्रथा प्रमुख उन क्षेत्रों में प्रचलित है, जिनमें 50,000 से अधिक मैला ढोने वालों के साथ उचित सीवेज सिस्टम का अभाव है, जैसे कि भारत में बुदौन जिला।

जातिगत भेदभाव

दलितों के उत्थान के लिए गगनभेदी नारे लगते रहे हों पर सच्चाई यह है कि आज भी सरकारों की गलत नीतियों के चलते बड़ी संख्या में दलित समुदाय के लोग इस तरह की प्रथा के जरिए अपनी आजीविका कमाने पर मजबूर हैं। विडम्बना यह है कि आज भी हिन्दू धर्म में बाल्मिकी समाज तो मुस्लिमों में हैला समाज के लोग देश में सर पर मैला ढोने का काम कर रहे हैं।

आर्टिकल 15 फिल्म में एक दृश्य जहां एक आदमी को एक गंदी और पानी से भरी हुई हुई मैनहोल में उतारा गया है वह किसी भी तरह से सुरक्षात्मक गियर से लैस नहीं है। वह पूरी तरह से उस गंदगी से लिपटा हुआ अन्दर जाता है।दृश्य को बहुत स्पष्टीकरण के बिना केवल कहानी में चुपचाप रखा गया है, क्योंकि ईमानदारी से, इसके बारे में गंभीरता सभी संस्करणों को बोलती है।

आज भी परम्परागत तरीके से सिर पर मैला ढोने का काम, शौचालयों की साफ सफाई, मरे जानवरों को आबादी से दूर करने, नाले नालियों की सफाई, शौचालयों के टैंकों की सफाई, चिकित्सालय में साफ सफाई, मलमूत्र साफ करने के काम को करने वाले सुमदाय के लोगों का जीवन स्तर और सामाजिक स्थितियां अन्य लोगों की तुलना में बहुत ही दयनीय है।

लिंग भेदभाव

63,713 के साथ महाराष्ट्र राज्य, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा और कर्नाटक राज्यों के बाद, मैनुअल मैला ढोने वाले के रूप में काम करने वाले सबसे अधिक परिवारों के साथ सूची में सबसे ऊपर है।उचित सीवेज सिस्टम या सुरक्षित प्रबंधन के बिना भारत के कुछ हिस्सों में मैनुअल स्कैवेंजिंग अभी भी जीवित है। यह महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेष में सबसे अधिक प्रचलित माना जाता है 2018 में एक अनुमान के अनुसार भारत में “स्वच्छता कर्मचारियों” की संख्या 5 मिलियन थी, और उनमें से 50% महिलाएं थीं।  हालांकि सभी स्वच्छता कार्यकर्ता मैनुअल मैला ढोने वाले नहीं होंगे। 2018 के एक अन्य अनुमान ने आंकड़े को एक मिलियन मैनुअल स्कैवेंजर्स पर रखा, जिसमें कहा गया कि यह संख्या “अज्ञात और घटती” है और उनमें से 90% महिलाएं हैं।

सामाजिक भेदभाव

अधिकांश हाथ से मैला ढोने वालों को उनकी नौकरी की प्रकृति के कारण समुदाय द्वारा कलंकित किया जाता है।।उन्हें अछूत माना जाता है और वे उनकी शर्त को मानने के लिए मजबूर हो जाते हैं।यह समस्या ज्यादा गहरी है क्योंकि उनके बच्चों के साथ भी भेदभाव किया जाता है और उन्हें अपने माता-पिता के समान काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।

मैनुअल स्कैवेंजिंग के कारण

जलजनित शौचालयों की कमी

शहरी क्षेत्रों में उपयोग किए जाने वाले प्रमुख शौचालय सूखे शौचालय हैं जो सिर पर मैला ढोने का एक प्रमुख कारण हैं।उदाहरण के लिए, भारत में हाउसिंग-लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस, 2011 की एक रिपोर्ट के आधार पर लगभग 26 मिलियन अस्वास्थ्यकर शौचालय हैं।इसके अलावा, ग्रामीण इलाकों में, सूखे शौचालयों को बदलने के लिए कोई रणनीति नहीं है।

अपूर्ण पुनर्वास और रोजगार के अवसरों की कमी

मैला ढोने की समस्या वाले अधिकांश देशों में स्वच्छता कर्मचारियों को पूरी तरह से पुनर्वासित करने का साधन नहीं है रोजगार के अवसरों की कमी एक प्रमुख चिंता है।इसके अलावा योजनाओं की कमी है जो उन परिवारों की मदद करेगी जिनके हकदार मैनुअल स्कैवेंजर्स हैं।

मुक्ति रणनीतियों का अभाव

मनोवैज्ञानिक रूप से मैला ढोने वालों को मुक्त करने के लिए कोई उचित रणनीति नहीं है। यह अभ्यास में उन लोगों को धक्का देता है जो मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम करते हैं ।

सामाजिक कलंक

लोग अपने काम की वजह से हाथ से मैला ढोने वाली को अछूत मानते हैं इसलिए, समाज सामुदायिक गतिविधियों में उन्हें स्वीकार करने और उन्हें शामिल करने के लिए तैयार नहीं है।कोई भी नियोक्ता उन्हें नौकरी नहीं देता है और, मकान मालिक उन्हें अपने घर किराए पर देने से रोकते हैं।

मैला ढोने वालों के अस्तित्व को नकारना

सरकारी और अन्य प्रमुख निजी संस्थान विशेष रूप से भारत में हुई मौतों के बावजूद मैला ढोने के अस्तित्व को नकारते हैं।नतीजतन, इस समस्या को हल करने के लिए कोई उपाय नहीं किए जाते हैं।कहीं न कहीं ये लोग एक अस्तित्वहीन जीवन यापन कर रहे हैं।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

सरकारों द्वारा इन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल अवश्य ही किया जाता हो, पर इन्हें मुख्य धारा में शामिल होने नहीं दिया जाता है। सरकारों द्वारा दलित उत्थान के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ इस वर्ग के लोगों को नहीं मिल पाता है, इस बात में कोई संदेह नहीं है।

भारत सरकार ने 1993 में सफाई कर्मचारी नियोजन और शुष्क शौचालय संनिर्माण (प्रतिषेध) अधिनियम 1993 लागू किया गया था, जिसके तहत प्रावधान किया गया था कि जो भी व्यक्ति यह काम करवाएगा उसे एक वर्ष के कारावास और दो हजार रूपए अर्थदण्ड की सजा का दण्ड भुगतना पड़ सकता है। लेकिन इतना सब कुछ करने के बाद भी इसे रोका नहीं जा सका। सरकार द्वारा इस काम में संलिप्त लोगों के बच्चों को अच्छा सामाजिक वातावरण देने, साक्षर और शिक्षित बनाने के प्रयास भी किए गये हैं।

सरकार ने इसके लिए बच्चों को विशेष छात्रवृत्ति तक देने की योजना चलाई है। इसके तहत बच्चों को छात्रवृत्ति भी दी गई। लेकिन जिन परिवारों ने इस काम को छोड़ा और कागजों पर जहां-जहां सिर पर मैला ढोने की प्रथा समाप्त होना दशार्या गया वहां के बच्चों की छात्रवृत्तियां भी बंद कर दी जाती हैं।

मैनुअल स्केवेंजर्स का रोज़गार और शुष्क शौचालय का निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993” के तहत भारत में हाथ से मैला ढोने की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसमें एक साल तक का कारावास और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

वर्ष 2013 में “मैनुअल स्केवेंजर्स के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013″ के रूप में एक नया ऐतिहासिक कानून पारित किया गया जो सभी रूपों में हाथ से मैला ढोने पर प्रतिबंध को मज़बूत करने की कोशिश करता है और अनिवार्य सर्वेक्षण के माध्यम से हाथ से मैला ढोने वाले लोगों की पहचान करके इनके पुनर्वास की पुष्टि करता है।

मैनुअल स्केवेंजर्स (हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों) के पुनर्वास की योजना (एसआरएमएस) के तहत हाथ से मैला ढोने वाले लोगों को 40,000/- रुपए की एकबारगी नकद सहायता, रियायती ब्याज दर पर 15.00 लाख रुपए तक की स्व-रोज़गार परियोजनाओं को शुरू करने के लिये ऋण; 3,25,000/- रुपए तक क्रेडिट लिंक्ड बैक-एंड कैपिटल सब्सिडी तथा प्रतिमाह 3000/- रुपए के वजीफे सहित दो वर्ष तक कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।

भारत सरकार द्वारा दो दशक पहले भारत में सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर रोक लगा दी गई है, लेकिन अभी भी देश के कई हिस्सों में यह परम्परा जारी है। भारत के अधिकांश गांवों में सीवरेज नहीं होने के कारण घरों से गंदा पानी निकलने की कोई प्रणाली नहीं है। ऐसे शौचालय भी नहीं, जहां मल निकास की व्यवस्था हो। देशभर में करीब सात लाख शौचालय ऐसे हैं, जहां मल निकास की व्यवस्था नहीं हैं। इन्हें शुष्क शौचालय कहा जाता है और यहां से मल साफ करने के लिए लोगों की जरूरत होती है।

भारत में इस कानून का सबसे बड़ा उल्लंघन करने वाला भारतीय रेलवे है जहां कई रेल गाड़ियों में पटरियों पर गाड़ियों से मलत्याग करने वाले शौचालय होते हैं और जो पटरियों को साफ करने के लिए मैला ढोने वालों को काम पर लगाते हैं।2018 में शौचालय कचरे के लिए ऑन-ट्रेन उपचार प्रणालियों को शामिल करके स्थिति में सुधार किया जा रहा है।

राजनीतिक स्वरुप

कहने को तो केंद्र और प्रदेश सरकारों द्वारा शुष्क शौचालयों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाता रहा है। लेकिन यह प्रोत्साहन किन अधिकारियों या गैर सरकारी संगठनों की जेब में जाता है, यह किसी से छुपा नहीं है। करोड़ों अरबों रूपए खर्च करके सरकारों द्वारा लोगों को शुष्क शौचालयों के प्रति जागरूक किया जाता रहा है, पर सालों साल बीतने के बाद भी नतीजा वह नहीं आया जिसकी अपेक्षा थी।

सरकार खुद मान रही है कि आज भी देश में मैला उठाने की प्रथा बदस्तूर जारी है। यह स्वीकारोक्ति निश्चित रूप से सरकार के लिए कलंक से कम नहीं है। यह कड़वी सच्चाई है कि कस्बों, गांवों में आज भी एक वर्ग विशेष द्वारा आजीविका चलाने के लिए इस कार्य को रोजगार के रूप में अपनाया जा रहा है। सरकारों द्वारा अब तक व्यय की गई धनराशि में तो समूचे देश में शुष्क शौचालय स्थापित हो जाने चाहिये थे। परन्तु ऐसा हुआ नहीं।

आये दिन सीवर और सेप्टिक टैंक में काम करते हुए सफाई कर्मियों के अपनी जान से हाथ धोने की खबरें आती रहती हैं। क्या यह देश के लिए जरूरी नहीं कि वह अपने सफाई कर्मचारियों को आधुनिक तकनीक से लैस मशीनें उपलब्ध कराए जिससे उनके जीवन की रक्षा हो सके और वे स्वच्छ पर्यावरण में जी सकें। यह जरूरी है कि मैला ढोने का सवाल मानवाधिकारों के दायरे में लाया जाए जिससे इसका उल्लंघन करने वालों पर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जा सके।

मैला ढोने तथा सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान लोगों की मौत –

स्वच्छ भारत अभियान की बात करने वाले लोग इस समस्या पर ज़्यादा से ज़्यादा सेफ्टी किट, दस्ताने और मास्क उपलब्ध कराने की बात करते हैं। इस समस्या के असल समाधान की तरफ़ कोई भी बढ़ता हुआ नहीं दिखता।सफाई के लिए मशीनों के इस्तेमाल पर सालों से बहस चल रही है पर ज़मीन पर अधिक बदलाव नहीं दिखाई देता ।

बड़े गर्व से बताया जाएगा कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत इतने लाख शौचालयों का निर्माण किया गया। पर इस पर चर्चा नहीं की जाती कि इन शौचालयों के भरने पर इनके गड्ढों की सफाई किससे करवाई जाएगी। सफाई के दौरान इनमें कितने लोगों की जान जाएगी। खैर ये तो बाद की बात है।

2011 की सामाजिक आर्थिक जनगणना के अनुसार, 180,657 परिवार आजीविका के लिए मैनुअल मैला ढोने में लगे हुए हैं। भारत की 2011 की जनगणना में पूरे भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग के 794,000 मामले पाए गए।

पिछले कुछ ही महीनों में 100 से अधिक लोग जहरीली गैस से सीवर में घुटन से मरे।  2017 में 221 लोग मौत के सीवर में समा गये। 1993 से अब तक 1790 लोगों को सीवर की जहरीली गैस ने मार डाला।

हाल ही में जारी किए गए राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (एनसीएसके) के आकंड़ों के मुताबिक इस साल के शुरुआती छह महीनों में देश के सिर्फ आठ राज्यों में 50 सफाई कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। एनसीएसके के अनुसार कि ये आंकड़े सिर्फ आठ राज्यों पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और तमिलनाडु के हैं।

2017 से पूरे देश में सीवर और सैप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हर पांच दिन में औसतन एक आदमी की मौत हुई है। आंकड़ों के मुताबिक 2014-2018 के दरम्यान सेप्टिक टैंक और सीवर की सफाई करते हुए 323 मौतें हुई हैं। 1993 से अब तक 817 कर्मचारियों की मौत सीवर की सफाई करते हुए हो चुकी है।

वहीं, एक दूसरी निजी संस्था सफाई कर्मचारी आंदोलन के एक आंकड़े के मुताबिक पिछले पांच साल में ये आंकड़ा 1,470 मौतों का है।

आपको बता दें कि सीवर सफाई के दौरान मरने वाले कर्मचारियों के परिवार को 10 लाख रुपये की सहायता राशि दिए जाने का प्रावधान है लेकिन मुआवजा देने के मामले में ज्यादातर राज्यों का रिकॉर्ड बहुत खराब है।

मैनुअल स्केवेंजिंग से होने वाली स्वास्थ्य समस्याएं

मार्च 2014 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने घोषणा की कि 96 लाख (9.6 मिलियन) शुष्क शौचालय मैन्युअल रूप से खाली किए जा रहे हैं, लेकिन मैनुअल मैला ढोने वालों की सही संख्या विवादित है – आधिकारिक आंकड़ों ने इसे 700,000 से कम रखा।

सिर पर मैला ढोने के कार्य को पतले बोर्डों , फट्टों जैसे बुनियादी उपकरणों के साथ किया जाता है और या तो बाल्टी या टोकरी को बोरी से ढंक दिया जाता है। नौकरी की खतरनाक प्रकृति के कारण, कई श्रमिकों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं:-

मैला ढोने वालों को हाइड्रोजन डाइसल्फ़ाइड, कार्बन (IV) ऑक्साइड, अमोनिया और मीथेन जैसी गैसों के संपर्क में लाया जाता है। हाइड्रोजन डाइसल्फ़ाइड के लंबे समय तक संपर्क में श्वासावरोध से मृत्यु हो सकती है।इसके अलावा, व्यक्ति को मिर्गी के दौरे का अनुभव हो सकता है और बेहोश हो सकता है और बाद में मर सकता है.।

एक अन्य प्रमुख स्वास्थ्य चिंता है, पुराने ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसे मस्कुलोस्केलेटल विकार।सीवर में कई बैक्टीरिया के निवास के कारण सीवर में संक्रमण के संपर्क में आना भी आम है . सामान्य संक्रमण लेप्टोस्पायरोसिस है जो एक व्यावसायिक बीमारी है जो सूअर जैसे जानवर तथा उनके अपशिष्ट के संपर्क में आने से होती है।

सीवर में काम करने वाले कृन्तकों के निर्वहन के संपर्क  में भी आते हैं जो सीवर में पाए जाते हैं और लेप्टोस्पोरोसिस से संक्रमित हो सकते हैं

अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में जिल्द की सूजन, हेलिकोबैक्टर पाइलोरी संक्रमण शामिल हैं जो गैस्ट्रिक कैंसर और श्वसन समस्याओं का कारण बनता है।

मैनुअल स्कैवेंजिंग के समाधान:-

1. पहल में विभिन्न अधिकारियों और समुदाय का समावेश

भारत में नया शौचालय जैसी पहलों के माध्यम से समस्या से निपटने के लिए, इसमें शामिल सभी प्रमुख स्केट धारकों को शामिल करना आवश्यक होगा। उनमें जिला अधिकारी, संबंध अधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी और अन्य संबंधित अधिकारियों के बीच जिला आपूर्ति अधिकारी शामिल हैं।कार्यक्रम में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले क्षेत्रों के आसपास समुदाय का समावेश भी समान महत्व का है।

अधिकारियों और समुदाय से जानकारी लेने से पहल के साथ आगे बढ़ने के सर्वोत्तम तरीके पर एक सूचित निर्णय के साथ आने में मदद मिलेगी।तब कार्यशालाओं को समझना चाहिए कि समस्या कितनी गहरी है और इसे कैसे हल किया जाए। समुदाय के साथ एक कार्यशाला से संगठन को स्थानीय लोगों के व्यवहार को समझने में मदद मिलेगी।स्थानीय लोग उन समाधानों पर एक सुझाव दे सकते हैं, जिनके साथ वे सहज महसूस करते हैं

2. जागरूकता पैदा करना

जिला नोडल अधिकारियों, गैर सरकारी संगठनों और स्वास्थ्य अधिकारियों को सूखे शौचालयों के कारण होने वाले विनाशकारी प्रभाव पर समुदाय को शिक्षित करना चाहिए।उन्हें स्वास्थ्य मुद्दों, स्वच्छता प्रथाओं, और स्वच्छता पर जन को शिक्षित करना चाहिए।सरकारी अधिकारियों को उन कानूनी निहितार्थों के बारे में सूचित करना चाहिए जो कि मैला ढोने और सूखे शौचालयों में संलग्न होने से संबंधित हैं।

एक बार गिरफ्तार होने के बाद जनता को उन दंडों के बारे में पता होना चाहिए जो वे सामना करेंगे।जागरूकता अभियान में न केवल मैला ढोने के खतरों को संबोधित किया जाना चाहिए, बल्कि इससे समुदाय को पैसे कमाने की एक वैकल्पिक पद्धति प्रभावित होगी।दूसरे छोर पर, स्वच्छता कर्मचारियों को उनके अधिकारों और कानूनों के बारे में सूचित किया जाना चाहिए जो उन्हें उनके नियोक्ताओं द्वारा दुरुपयोग से बचाते हैं।

3. मैनुअल स्कैवेंजर्स का पुनर्वास और पुनर्स्थापन

अधिक रोजगार का सृजन सबसे महत्वपूर्ण पुनर्वास प्रक्रियाओं में से एक है।बनाई गई नौकरियों का उद्देश्य स्थानीय लोगों को समान अवसर प्रदान करना होगा।सृजित नौकरियों ने समुदाय में मैनुअल मैला ढोने वालों को आत्मसात करने के साधन के रूप में भी काम किया। अन्य क्षेत्र जो सामाजिक समावेशन से जुड़े हैं, उदाहरण के लिए ऋण योजनाओं को भी स्थापित किया जाना चाहिए।

उन्हें रोजगार देने और उन्हें कुछ पैसे उधार देने से उन्हें समुदाय में कदम रखने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास मिलता है।भारत में ऋण योजनाएं जो मैनुअल मैला ढोने वालों की मदद करेंगी वे हैं विशेष घटक योजना, MGNREG अधिनियम (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम), छात्रवृत्ति, पेंशन योजना, ग्रामीण आवास ।

4.स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करना

मैनुअल स्केवेंजर्स और उनके परिवार को प्रशिक्षण देना कि कैसे एक गड्ढे वाले शौचालय का निर्माण दो उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।सबसे पहले, एक शौचालय के निर्माण पर ज्ञान वाले लोगों की संख्या में वृद्धि होगी और इसलिए, क्षेत्र में अधिक शौचालय का निर्माण किया जाएगा।दूसरे, वे यात्री जो गड्ढे वाले शौचालय के निर्माण में आवश्यक ज्ञान प्राप्त करते हैं और फिर उसी से संबंधित नौकरी की तलाश कर सकते हैं।प्रशिक्षण का आयोजन विभिन्न संगठनों द्वारा अनुभवी राजमिस्त्री की मदद से किया जा सकता है।

5. कानून का प्रवर्तन

सरकार को मैला ढोने पर रोक लगाने वाले कानून को लागू करना चाहिए।भारत जैसे देश में कानून 1993 में लागू किया गया था और 2013 में इसमें बदलाव किए गए हैं।हालाँकि, सरकारी संस्थाएँ हाथ से मैला ढोने वालों के अस्तित्व को नकारने के लिए कार्य करने में संकोच करती हैं।ऐसी अमानवीय गतिविधियों में दूसरों को अधीन करने वाले लोगों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए।

6. शिक्षा

जिन बच्चों के परिवार मैला ढोने में शामिल हैं, वे बहुत से सामाजिक कलंक का अनुभव करते हैं जो उनकी शिक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।। इसके अलावा, मैला ढोने का काम बहुत कम पैसा पैदा करता है जो एक बच्चे को शिक्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।। इसके अलावा, मैला ढोने का काम बहुत कम पैसा पैदा करता है जो एक बच्चे को शिक्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

अंत में बच्चा पढ़ाई  छोड़ने और उनके माता-पिता से जुड़ने का काम करता है।इन बच्चों को पढ़ाई पूरी करने में मदद करने वाली योजनाओं का कार्यान्वयन मैनुअल स्कैंगिंग से जुड़े सिद्धांतों और मिथकों को छोड़ने में एक प्रभावी रणनीति होगी।

यह कटु सत्य है कि सिर पर मैला ढोने से मुक्ति ना तो सरकार के हाथों संभव है और ना ही स्वयंसेवी संस्थाओं की बदौलत। इसके लिए पहल स्वयं सफाई कर्मियों को ही करनी होगी और इसका प्रारंभिक कदम होगा आत्म सम्मान को पहचानना। अपने कर्तव्य की महत्ता को समझना। जागरूकता की कुंजी साक्षरता है। अतएव समाज के शिक्षित वर्ग को आगे आकर इस दलित समाज को शिक्षित करने का बीड़ा उठाना चाहिये। शिक्षा से बदलाव सम्भव हो पायेगा।

 इसे भी देखें –

http://mail.padtal.com/news/news_detail/madras-high-court-fines-25000-to-dalit-couple-as-they-refused-to-work-as-manual-scavenger

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