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सफ़ूरा ज़रगर – चरित्र हनन और पितृसत्ता का भद्दा स्वरुप

आत्मनिर्भर और अपने हक के लिए आवाज़ उठाने वाली महिलाएं उसके लिए आंख में धूल के कण की तरह चुभती हैं। उन्हें चुप करने के लिए कुछ असामाजिक तत्व किसी भी हद तक जा सकते हैं। सफ़ूरा ज़ारगर को कैद और उनके चरित्र की हत्या एवम् उनकी छवि को खराब करना इसी तरह का एक प्रयास है|

सफ़ूरा ज़रगर – चरित्र हनन और पितृसत्ता का भद्दा स्वरुप

देश के हालात चाहे जैसे भी हो भारतीय समाज में महिलाएं आज भी असामाजिक तत्वों की छोटी सोच का शिकार होती रहती हैं। हर नए दिन एक नई गलतफहमी एक नया झूठा आरोप महिलाओं के ऊपर लगता रहता है। हर रोज महिलाएं पहले से भी अधिक संकीर्ण सोच का सामना करती हैं।शायद यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय समाज इस हद तक सीमित हो गया है कि उसे महिलाओं के सम्मान और प्रतिष्ठा की अब कोई आवश्यकता ही महसूस नहीं होती है। आत्मनिर्भर और अपने हक के लिए आवाज़ उठाने वाली महिलाएं उसके लिए आंख में धूल के कण की तरह चुभती हैं। उन्हें चुप करने के लिए कुछ असामाजिक तत्व किसी भी हद तक जा सकते हैं। सफ़ूरा ज़रगर – चरित्र हनन और कैद एवम् उनकी छवि को खराब करना इसी तरह का एक प्रयास है। जिसमें महिलाओं को हर प्रकार से दबाया जाता है।

सफ़ूरा ज़रगर ज़ामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्नातकोत्तर छात्रा है।सफ़ूरा ज़रगर जिन पर आरोप है की फरवरी 2020 के आखिरी सप्ताह  में दिल्ली में जो दंगे हुए थे और सरकार के विरोध जो प्रदर्शन हुआ था उसमें इनका हाथ है । इस प्रदर्शन में लगभग 50 लोगों की मौत हुई थी। साथ ही 22 फरवरी की रात को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ सफ़ूरा ज़रगर जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे हिंसक भीड़ को लेकर पहुंची और हालातों को दंगो के रूप में बदल दिया । सफ़ूरा ज़रगर पर लगे आरोप अत्यंत संगीन है जिसके चलते कोर्ट ने उनकी जमानत की अर्जी भी खारिज कर दी है । 

दूसरी तरफ अभी हाल ही में उनके गर्भवती होने की खबर तेजी से फैली। लेकिन लोगों ने इस खबर को इतने गलत तरीके से सोशल मीडिया स्तर पर फैलाया जिसका असर सीधे-सीधे सफ़ूरा के चरित्र पर पड़ा। सफ़ूरा ज़ारगर के गर्भवती होने पर अनेक प्रश्न उठे और अनेक टिप्पणियां भी की गई। टि्वटर ,फेसबुक ,इंस्टाग्राम लगभग हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सफ़ूरा ज़रगर के गर्भवती होने का मजाक बनाया गया। इसका सीधा संबंध शाहीन बाग में हो रहे धरने से जोड़ा जा रहा है। शादीशुदा होने के बावजूद भी सफूरा को अविवाहित बताया गया और प्रश्न उठाया गया कि आखिर इस बच्चे के पिता कौन है? लेकिन किस हद तक यह तर्क सही बैठता है कि आप एक महिला की निजी जिंदगी पर बिना जाने कोई भी सवाल खड़ा कर दें । केवल कुछ असामाजिक तत्व मिलकर हर बार उन औरतों के खिलाफ ऐसे झूठे दावे करते हैं जो अपने दम पर इस देश में कुछ करना चाहती हैं ,इस समाज को एक नई दिशा देना चाहती हैं।

सफ़ूरा ज़रगर पर उनकी शादी को लेकर जितने भी भद्दे कमेंट किए गए या जितने भी जूठे दावे किए गए आखिर वो किस आधार पर किए गए। उन लोगों के पास ये झूठी ख़बरें आई कहां से ? यहां एक बार फिर से भारतीय मीडिया की प्रमाणिकता पर सवाल खड़ा होता है। कितनी आसानी से झूठी खबरें हवा की तरह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैल जाती है ,जनता उस पर यकीन भी करने लग जाती है। इस तरह बिना गलती के भी किसी व्यक्ति के जीवन को आसानी से  बर्बाद किया सकता है।हालांकि अब इस बात से पर्दा उठ चुका है कि वह शादीशुदा है।इसके अलावा जो लोग उसकी शादी की गवाही दे रहे हैं, उन्हें लगता है कि अगर वे साबित कर सकते हैं कि वह शादीशुदा है तो इस मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा। 

आखिर क्यों सफ़ूरा के चरित्र पर उंगली उठाना और उसके बारे में झूठी खबर फैलाना इतना आसान  था ? सिर्फ इसलिए की वह एक महिला है या फिर एक मुस्लिम महिला। आखिर क्यों सफूरा ज़रगर को इंटरनेट पर इतना ट्रोल किया जा रहा है ।क्योंकि वह एक कश्मीरी, एक कश्मीरी महिला, दिमाग वाली एक कश्मीरी महिला है, जो बोलती भी है, दिमाग वाली एक कश्मीरी महिला जो न केवल बोलती है बल्कि मुख्य भूमि भारत में विरोध प्रदर्शन का आयोजन करती है और भाग लेती है ।सीधा सा प्रश्न उठता है अगर सफूरा ज़रगर की जगह इस स्थिति में कोई पुरुष होता जिस पर यह सभी आरोप लगे होते हैं क्या तब भी हमारा समाज उनके चरित्र पर उनके निजी जीवन पर इतनी ही बुरी तरह आक्रमण करता। सफ़ूरा ज़ारगर एक अपराधी है या नहीं इसका फैसला कानून करेगा लेकिन उनकी निजी जिंदगी का मजाक उड़ाना या उस पर झूठी टिप्पणी करना कहां तक सही है। 

आखिर कब तक हमारे देश की महिलाएं पितृसत्तात्मक सोच का शिकार होती रहेंगी। कब तक उनकी आवाज को लगातार दबाया जाता रहेगा। जरूरी तो नहीं है कि अगर देश हित में कोई आवाज उठाई जा रही है तो वह पुरुषों की ही हो या पुरुषों द्वारा ही उठाई जाए और अगर कोई महिला आवाज उठा रही है, महिला कहीं अपने विचार प्रकट कर रही है तो वह गलत है। उसकी आवाज को दबा देना चाहिए। शायद एक बार के लिए उस आवाज को अहमियत दी जाए अगर वह किसी शक्तिशाली महिला की आवाज है मगर यदि वह आवाज किसी साधारण महिला या किसी निम्न वर्ग की महिला की आवाज है तो उसका कोई मूल्य नहीं है। उस आवाज को दबाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाता है। हमारा समाज आज भी महिलाओं को केवल भोग‌ वस्तु की नजर से देखता है। क्यों महिलाओं से जुड़ा हुआ कोई भी मुद्दा उनकी निजी जिंदगी और उनके निजी संबंधों या उनके चरित्र पर आकर रुक जाता है। आखिर क्यों हर बार महिला विमर्श उनकी पारिवारिक स्थिति के साथ ही शुरू होता है। कितना आसान है कि अगर किसी महिला की आवाज को दबाना है तो सीधा सीधा उसके चरित्र उसके निजी जीवन और उसकी सोच पर वार किया जाए तभी उसको तोड़ा जा सकता है।

ऐसे में यहां अपने विचारों की अभव्यक्ति के अधिकार की सीमाएं पुरुषों ओर महिलाओं के लिए अलग अलग प्रतीत हो रही हैं।यहां तक कि महिलाओं के संदर्भ में भी इसकी सीमा उसके धर्म , जाति और वर्ग में बंट कर रह गई है। इस मामले जा हर पहलू एक नया प्रश्न खड़ा कर रहा है। इस मामले में प्रश्न इतने ज्यादा है लेकिन उत्तर देने वाले काफी कम।क्योंकि सब जानते हैं अगर कोई इस समाज के नियमों के खिलाफ जाकर किसी के पक्ष में अपना सहयोग देगा तो यह समाज उसे भी अपना शिकार बनाने में देर नहीं लगाएगा  । जब संविधान ने प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार प्रकट करने का अधिकार दिया है और भारत में सभी नागरिकों  अपने हक के लिए आवाज़ उठाने की स्वतंत्रता है तो फिर क्यों सफ़ूरा ज़ारगर तथा उनके जैसे ही अन्य मुस्लिम कार्यकर्ताओं कि आवाज़ को  तरह दबाया जा रहा है। ये सभी लोग केवल विद्यार्थी या किसी संस्था के सदस्य हैं ना की कोई देश द्रोही ,इसलिए इनके साथ ऐसा व्यवहार करना तर्कसंगत नहीं दिखाई देता ।

इस समय देश कोरोनावायरस महामारी के अत्यंत प्रचंड दौर से गुजर रहा है ऐसे में सफ़ूरा ज़रगर तथा उनके जैसे ही अन्य मुस्लिम कार्यकर्ताओं को पकड़ कर जेल में डालना क्या किसी साजिश की ओर संकेत करता है। सफ़ूरा ज़रगर तथा अन्य मुस्लिम कार्यकर्ताओं के जेल जाने की खबर पर केंद्र सरकार और अरविंद केजरीवाल की चुप्पी आम बात है। क्योंकि केंद्र सरकार उस समय भी चुप रही थी जब उत्तर पूर्वी दिल्ली में मुसलमानों के खिलाफ विद्रोह चल रहा था तो सफूरा ज़रगर के गर्भवती होने के बावजूद भी जेल में बंद होने पर उनका चुप रहना कोई बड़ी बात नहीं है । 

लेकिन शाहीन बाग में हो रहे CAA के विरोध में जो महिलाएं धरने में भाग ले रही थी कहीं ना कहीं वह एक आवाज को बुलंद कर रही थी । ऐसी आवाज जो देश की अन्य महिलाओं की सोच की बेड़ियों को तोड़ने का काम कर रही थी, उनको सशक्त होने का संदेश दे रही थी ।लेकिन सरकार द्वारा लगातार उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया गया। असामाजिक तत्वों द्वारा उनकी छवि को खराब करने का प्रयास किया गया, सफ़ूरा ज़रगर के मामले में भी ऐसा ही हुआ है। यह इतनी कठिनाइयों के बाद था कि मुस्लिम महिलाओं को आखिरकार शाहीन बाग के विरोध के बाद विशेष रूप से अपनी आवाज मिल रही थी।सफ़ूरा ज़रगर अन्य मुस्लिम कार्यकर्ताओं का इस तरह जेल में बन्द होना उनके द्वारा किए गए सभी प्रयासों को बेअसर करने के लिए एक हमला है और एक संदेश है कि महिलाओं को खासकर मुस्लिम महिलाओं को सार्वजनिक मामलों पर नहीं बोलना चाहिए।

गौर करने वाली बात है कि जब देश इतनी बड़ी महामारी के दौर से गुजर रहा है उस समय में क्या एक गर्भवती महिला को इस तरह जेल में बंद करना सही है, जहां उनके स्वास्थ्य को सबसे ज्यादा खतरा है। वहां उनकी सेहत और साथ ही बच्चे की सेहत को भी खतरा है। जेल की साफ सफाई के बारे सभी को पता है । इसमें कोई संदेह की बात नहीं है कि वहां उनकी देखभाल अच्छे से नहीं हो रही है, उन्हें वो सारी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं जो इस हालत में उन्हें मिलनी चाहिए । 

इसके बावजूद भी हर न्यूज़ चैनल केवल सफ़ूरा ज़रगर पर लगे आरोपों के आधार पर उनको जनता के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। अनेक संस्थाओं की मामले पर चुप्पी काफी हद तक असाधारण सी दिखाई दे रही है। कहां हैं वो निजी तथा सरकारी संगठन जो हमेशा महिलाओं कि सुरक्षा व सम्मान के लिए लड़ने का दावा करते हैं। वो महिला राजनेता इस मामले पर क्यों चुप्पी धारण किए हुए हैं जो स्वयं देश के हित एवम् महिलाओं के विकास के लिए कार्य करने का दावा करती हैं। यह मामला इतना भी आम नहीं है की इस मामले पर कोई भी संस्था आगे आकर अपने विचार या सफूरा के बचाव में कोई बयान ही नहीं दे रही है।क्या वाकई इस तरह के उदाहरणों के साथ हम एक श्रेष्ठ भारत की कल्पना कर रहे हैं? इसका प्रश्न का उत्तर शायद इतना भी सरल नहीं के कुछ उदाहरणों में इसे सिमटा कर इसे जनता के सामने रखा जा सके।

जब तक समाज की एकतरफा एवम् अत्यंत छोटी सोच असामाजिक तत्वों को बढ़ावा देती रहेगी और अशिक्षित और असभ्य लोग मौजूद रहेंगे तब तक इस देश में अपने तथा दूसरों हक के लिए आवाज़ उठाने वालों को इसी तरह दबाया जाएगा ।

लेखक द्वारा व्यक्त किए गए विचार और राय व्यक्तिगत हैं और जरूरी नहीं कि यह VOM की आधिकारिक नीति या स्थिति को दर्शाता हो।

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  1. Jinhone jhoot phailaya, wo ye jante hai ki ye jhoot hai. Lekin nafrat hai jo insan ko uksa rahi hai.
    That’s why it is rightly said “Know the truth and you shall know its people”

  2. मैं समझता हूँ सफूरा के केस में “चरित्र हनन” और “पितृसत्ता” से बड़ा रोल वो मुसलामानों के खिलाफ फैलाई गयी सांप्रदायिक नफरत है जिसको 2014 के बाद बढ़ चढ़ कर खूब फ़रोग़ मिला और जिसके बदतरीन नतीजे अब खुल के सामने आने लगे हैं – हालाँकि आज़ाद हिंदुस्तान में ये कोई नयी बात नहीं है, पर 2014 के बाद इसकी आवृत्ति (frequency) और तीव्रता (intensity) में ज़रूर बढ़त हुई है!

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