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शाहीन बाग़: केवल विरोध नहीं, एक आंदोलन भी

सीएए, एनआरसी, एनपीआर यह इन सभी के आने से मुस्लिम समुदाय को एक तरह से देश से बाहर धकेल देने का प्रयास किया गया है। इसलिए अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उन्होंने यह विरोध किया और यह केवल एक विरोध नहीं रह गया बल्कि इसने एक आंदोलन का रूप ले लिया।

8 अगस्त को Karvaan India की तरफ से “What Led To Shaheen Bagh” पर चर्चा करते हुए ज़िया-उस-सलाम के साथ एक ऑनलाइन चर्चा का आयोजन किया गया। इस चर्चा में ज़िया-उस-सलाम ने बताया की किस तरह ऐसे अनेक पहलू लोगों की नज़रों से छुपे हुए हैं, जो शाहीन बाग़ से जुड़े हैं ।

चर्चा के शुरुआत में मेज़बान असद अशरफ ने सबसे पहले ज़िया उस सलाम इस किताब को लिखने की वजह पूछी। इसके उत्तर में उन्होंने बताया कि आज के समय में सरकार शाहीन बाग़ से जुड़ी हर याद को मिटा देना चाहती हैं । ताकि इस महामारी के समाप्त होने तक लोगों के मन से शाहीन बाग़ से जुड़ी हर याद ख़त्म हो जाए और यह विरोध पूरी तरह से दब जाए। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। क्योंकि शाहीन बाग़ की कहानी केवल मुस्लिम औरतों को आवाज़ देने तक की नहीं है ।बल्कि इससे भी कहीं ज़्यादा है। यह विरोध अन्य आंदोलनों के समान नहीं है क्योंकि इस विरोध का नेतृत्व पुरुषों की बजाय महिलाओं ने किया और पुरुषों ने उनका साथ दिया। इसलिए यह आवश्यक था की लोगों तक इसकी पूरी कहानी पहुंचे।

इसके बाद असद अशरफ ने पूछा कि इस विरोध को लेकर लोगों के बीच अनेक तरह के मत बने हुए हैं, आपके अनुसार यह विरोध क्यों हुआ? इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि यह कोई आम विरोध नहीं था। लोगों के अस्तित्व पर ख़तरा मंडरा रहा था। उनके लिए उनके अस्तित्व को बचाने का एक यही रास्ता था। जैसा कि हम जानते हैं इससे पहले कोई भी मुस्लिम ना तो शाहबानो केस ,ना ही तीन तलाक़ और ऐसे अनेक मुद्दों पर कभी भी विरोध करने सड़कों पर नहीं उतरे थे। लेकिन जब से सीएए, एनआरसी, एनपीआर के ज़रिए मुस्लिम समुदाय को एक तरह से देश से बाहर धकेल देने का प्रयास किया गया है। इसलिए अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उन्होंने यह विरोध किया और यह केवल एक विरोध नहीं रह गया बल्कि इसने एक आंदोलन का रूप ले लिया। साथ ही उन्होंने बताया कि किस तरह शाहीन बाग़ आंदोलन अन्य आंदोलनों से अलग था उन्होंने बताया कि उन्होंने इससे पहले किसी भी आंदोलन या विरोध में लाइब्रेरी, आर्ट गैलरी या स्ट्रीट आर्ट जैसी सुविधाएं नहीं देखी थी। यह आंदोलन केवल लोगों के हक़ के लिए नहीं था बल्कि उन्हें जागरूक करने के लिए भी एक महत्वपूर्ण तरीक़ा था।

इस प्रश्न पर कि आज तक जितने भी बड़े आंदोलन हुए हैं उन सभी का नेतृत्व पुरुषों ने किया है तो इस विरोध में पुरुष किस तरह पीछे रह गए? जिया-उस-सलाम ने बताया कहा कि जैसा कि हम सभी जानते हैं कि महिलाओं को पहले घरों पर रखा जाता था उन्हें ज़्यादा बाहर निकलने नहीं दिया जाता था। लेकिन इस आंदोलन ने स्थिति को बदल दिया है महिलाओं को एक पहचान दी है। जामिया में हुए विरोध के बाद महिलाओं ने फ़ैसला लिया कि अब चुप नहीं बैठेंगी और इसका विरोध करेंगी। साथ ही उन्होंने बताया कि यदि ऐसे क़ानून लागू होते हैं तो इसका सबसे ज़्यादा असर मुस्लिम महिलाओं पर ही पड़ेगा। क्योंकि जितने भी मुस्लिम पुरुष हैं वह कहीं ना कहीं किसी रोज़गार में लगे हुए हैं और उनके पास उनके अस्तित्व को बचाने के लिए कोई न कोई पहचान पत्र या अन्य कोई दस्तावेज़ अवश्य मौजूद होंगे। किंतु महिलाएं जो ज़्यादा से ज़्यादा घरों के अंदर ही रहती हैं उनके पास ऐसे कोई दस्तावेज़ मौजूद नहीं होंगे जिससे वह खुद को भारतीय नागरिक साबित नहीं कर सकती। इसलिए महिलाओं के लिए यह आवश्यक हो गया था कि वह बाहर निकले और इसका विरोध करें।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए ज़िया-उस-सलाम ने बताया कि किस तरह बरसों से चली आ रही धारणाओं और मिथकों को समाप्त कर दिया। इस आंदोलन से ना केवल मुस्लिम महिलाओं को बल्कि अन्य समुदाय की महिलाओं को भी एक आशा मिली है। इसी वजह से अन्य समुदाय के लोगों खासकर महिलाओं ने इस विरोध में इन महिलाओं का साथ दिया। अनेक राज्यों से महिलाएं इस विरोध में शामिल होने के लिए आई जो यह साबित करता है कि सीएए वाकई में ग़लत है।

असद अशरफ ने उनसे पूछा कि जब भी इस विरोध की बात करते हैं तो हम केवल महिला तथा उनके द्वारा किए गए कार्यों की ही बात करते हैं लेकिन विरोध में अनेक पुरुषों ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है तो हम उनकी बात क्यों नहीं करते हैं। इसके उत्तर में उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि कहीं भी पुरुष कार्यकर्ताओं के योगदान का कोई महत्व नहीं है। ऐसे अनेक नाम है जैसे शरजील इमाम, आसिफ़, मुस्तफ़ा जिनका ज़िक्र हमेशा एक समझदार नेता के रूप में किया किया जाता है। हालांकि कई लोगों ने शरजील को राय दी थी कि वह जंतर मंतर पर विरोध करें। परंतु उन्होंने अपनी बुद्धिमता का प्रयोग किया और इस विरोध को जंतर-मंतर पर होने वाले आम विरोधों की संख्या में सम्मिलित नहीं होने दिया और इस विरोध को किसी अन्य जगह पर ना करके शाहीन बाग़ में ही किया। तो यह कहना बिल्कुल ग़लत होगा कि कहीं भी मुस्लिम पुरुषों का ज़िक्र इस आंदोलन में नहीं किया गया।

अंत में ज़िया उस सलाम ने बताया कि यदि हम यह सोचे कि हमारी महिलाएं इस महामारी के दौर में चल रहे गिरफ़्तारी के सिलसिले से घबराकर बाद में इस आंदोलन में फिर से वापस नहीं आएंंगी, तो यह हमारे लिए शर्म की बात है। ऐसा सोचना भी ग़लत है हमें पूरा यक़ीन है कि जैसे ही यह महामारी ख़त्म होगी यह महिलाएं वापस आएंंगी और फिर से इस विरोध को जारी रखेगी। जिस तरह सरकार लगातार मुस्लिम कार्यकर्ताओं और विरोधियों की गिरफ़्तारी करवा रही है इससे साफ़ पता लगता है कि सरकार को डर है कि कहीं यह विरोध फिर से ना खड़ा हो जाए। किंतु सरकार को बताना चाहूंगा कि केवल मुस्लिम कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने से यह विरोध नहीं दबाया जा सकता। क्योंकि यह विरोध केवल मुस्लिमों का नहीं है। संपूर्ण भारत से अन्य समुदाय के लोग भी इस विरोध में शामिल है। अतः इस विरोध को दबाना कठिन होगा।

मेज़बान के अंतिम सवाल पर कि इस आंदोलन में कोई एक मुख्य नेता चेहरा उभर कर सामने नहीं आया ज़िया उस सलाम ने बताया कि यह एक बहुत बड़ा आंदोलन है। ऐसी अनेक राजनीतिक पार्टियां भी हैं जिन्होंने इस आंदोलन के साथ जुड़कर अपनी छवि को उभारने का प्रयास किया। लेकिन हमारे कार्यकर्ताओं ने उन्हें इस विरोध से दूर ही रखा और इस विरोध को राजनीतिक रूप पकड़ने से हमेशा बचाए रखा। कोई एक चेहरा मुख्य नेता के रूप में इसलिए उभरकर नहीं आया क्योंकि हर समय प्रत्येक समझदार व्यक्ति ने आकर इस आंदोलन का नेतृत्व किया तथा अन्य नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों का भी साथ दिया ।  अंत में यह चर्चा श्रोताओं के प्रश्न उत्तर के साथ समाप्त हुई असद अशरफ ने उनको को उनकी पुस्तक के लिए बधाई दी साथ ही इस चर्चा में शामिल होने के लिए उनका धन्यवाद दिया और इस चर्चा का समाप्त किया।

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