in , ,

पिज़्ज़ा, फ़ुट-मसाजर से परे सुक्खा की सेवा

इस आंदोलन में ऐसी भी छोटी छोटी खबरें हैं जो नेशनल मीडिया की नज़रो में नहीं आती, मगर इस आंदोलन को और आर्गेनिक बना देती हैं। जिसमें से एक छोटी सी कहानी है मुस्लिम भाई सुक्खा की, उर्फ़ मोहम्मद इरशाद।

सिंघू बॉर्डर पर मौजूदा किसान आंदोलन में हिस्सा ले रहे बुज़ुर्ग लोगों के लिए खालसा ऐड ने बड़ी गिनती में फुट मसाजर इनस्टॉल किये, यह खबर आप में से कई लोगों ने पढ़ी होगी या सुनी होगी। जहां इस तरह की खबरें हमारे प्रोटेस्ट के स्केल के बारे में हमें बताती हैं, वहीं इस आंदोलन में ऐसी भी छोटी छोटी खबरें हैं जो नेशनल मीडिया की नज़रो में नहीं आती, मगर इस आंदोलन को और आर्गेनिक बना देती हैं। जिसमें से एक छोटी सी कहानी है मुस्लिम भाई सुक्खा की, उर्फ़ मोहम्मद इरशाद। इरशाद पटियाला में अपनी एक छोटी से हेयर ड्रेसर की दुकान चलाते हैं। पिछले दिनों सिंघु बॉर्डर पर घूमते समय अचानक मेरी नज़र एक ट्राली पर टंगे पोस्टर पर गयी जिस पर पंजाबी में लिखा था किसान आंदोलन की हिमायत में मुस्लिम भाई सुक्खा उर्फ़ मद इरशाद हेयर ड्रेसर पटियाला की तरफ से सेवाहित में बुज़ुर्गो के शरीर की मालिश की जाती है – फोर्ड कंपनी के सामने। यह पोस्टर देखकर मैं एकदम रुकी। ट्राली के सामने छोटे से स्टूल पर अपना काले रंग का बैग रखे और नीचे एक दरी बिछाये हुए पास में इरशाद भाई खड़े थे। जब मैंने उनसे जाकर बात किया तब उन्होंने बताया कि उनको तीन दिन हो गए आये हुए। जब उनसे पूछा गया कि वो तो हेयर ड्रेसर हैं तो फिर यहां पर वो मालिश क्यों करना चाहते हैं। लोगो की तो उन्होंने कहा कि मैं बस सेवा में अपना हिस्सा डालना चाहता हूं। बेशक पेशे के तौर पर मैं एक हेयर ड्रेसर हूं लेकिन यहां क्यूंकि सिख भाई बड़ी तादाद में है तो मैं हेयर ड्रेसर का काम नहीं करना चाहता। सिख लोग बाल काटने को बुरा मानते हैं। मैं आंदोलन में शामिल बुज़ुर्गो की, जो कई दिनों से घर का आराम छोड़कर यहां ट्रालियों में सो रहे हैं, मालिश कर के अपना योगदान डालना चाहता हूं। इरशाद भाई ने बताया कि वो तीन दिन और यहां रुकेंगे। जब उनसे पूछ गया कि मीडिया तो प्रचार कर रहा है कि यह सिर्फ पंजाब के किसानों का आंदोलन है तो आप यहां क्या कर रहे हैं, जबकि किसानी आपका पेशा तो नहीं है। उन्होंने कहा कि यह किसान भाई हमारी वजह से ही आज यहां पर हैं। ये सिर्फ किसान भाइयों का मुद्दा नहीं है। अगर कल को फसल प्राइवेट कम्पनियां खरीदेंगी तो हमारे लिए भी महँगाई बढ़ जाएगी। इस वजह से यह हमारा ही मुद्दा है और आज जब किसान भाई आगे होकर लड़ रहे हैं तो हमारी भी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपना योगदान डाले, मैं बस वही योगदान डालने के लिए आया हूं। बस मुझे सेवा करनी थी और वही सेवा मैं आज यहां कर रहा हूं।

दोस्तों ऐसी कई कहानियां इस आंदोलन के कोने कोने में छिपी हैं और यही इस आंदोलन की खूबसूरती है।

This article was originally published by Navkiran Natt in Trolley Times. 

What do you think?

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

Comments

0 comments