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उपनाम , उत्पीड़न और राजनीति

पूरे देश में अल्पसंख्यक दलित और महिला सबसे गंभीर और पेचीदा मसले माने जाते हैं हर तरफ उनके संरक्षण और आरक्षण की बातें चलती रहती हैं। लेकिन इसके बावजूद सबसे ज़्यादा प्रताड़ित होने वालों में यही शुमार होते हैं। हर तरफ इनका ही हनन होता है।

तुम्हारा उपनाम क्या है ? खान, अहमद, मोहम्मद? गाय बेचते हो, चमड़ा कारोबारी हो! अच्छा चलो बोलो जय श्री राम वरना यही ठोक देंगे।

सही कह रही हूँ ना?

आख़िर यही तो हो रहा है आजकल। उपनाम से उत्पीड़न और उत्पीड़न से राजनीतिक मुद्दा बनने में देर थोड़ी ना लगती है। जिस धर्म का उद्देश्य प्रेम का विस्तार करना है उस धर्म के ही कुछ ठेकेदार राम का नाम लेकर न जाने कितने बेगुनाहों को मौत की नींद सुला देते हैं।

उपनाम अगर खान , अहमद , शेख  हो या महतो , चमार या सोनकर हो तो उसे चोर उचक्का अपराधी सिद्ध करने में ज़रा देर नहीं होती, जहां कफील खान को उनके खान उपनाम के कारण आज़ाद देश में आवाज बुलंद करने पर महीनों जेल में नज़रबंद कर दिया जाता है। वहीं देश के नागरिकों को गद्दार बताकर उन्हें गोली मारने का नारा देने वाले कपिल मिश्रा को उनके मिश्रा उपनाम के कारण पूरी आज़ादी मिली रहती है। यहां तक कि वह किसी ज़िम्मेदार राजनीतिक पार्टी के स्टार प्रचारक भी रहते हैं, तो कभी किसी मोड़ पर बांधकर किसी  तबरेज की हत्या कर दी जाती है तो कभी गाय का मांस बेचने के झूठे आरोप में किसी अन्य बेगुनाह की।

लेकिन उत्पीड़न केवल मुसलमान झेल रहा है यह कहना भी गलत होगा क्योंकि समाज का एक और बड़ा और पिछड़ा वर्ग जिसे हम दलित कह कर पुकारते हैं, जिसमें जन्में एक बच्चे ने भारत को उसका संविधान दिया था, वह भी वक्त बे वक्त प्रताड़ित होता रहता है। कभी उसे अपने वर्ग के कारण ज्यादा दोस्त नहीं मिल पाते तो कभी उन्हें साथ रखकर भी हीन करनीस कराया जाता है। ऐसे समय में जहां दलितों को समानता दिलान, आरक्षण देने की बातें चलती रहती है, ऐसे समय में भी छूत-अछूत की मानसिकता कहीं ना कहीं राज कर रही है। ना जाने कितने ही दलित इस मानसिकता से प्रताड़ित होकर हर रोज़ अपनी जान दे रहे हैं।

ऐसे में सरकार की अपनी जनता के प्रति क्या जिम्मेदारी बनती है? क्या यह चर्चा का विषय नहीं है? क्या हमें रोज़ हो रही मौतों का सरकार से हिसाब नहीं लेना चाहिए? क्या हमें रैलियों में घुसकर उनके ना के बराबर कामों की जय जयकार करनी चाहिए? राजनेताओं को चुनते हैं हम, उन्हें राजनीति करने का अधिकार देते हैं हम , तो क्या यह हमारा ही कर्तव्य नहीं है कि उनसे अपने द्वारा दिए गए मत का सही उपयोग करवाएं ।

पूरे देश में अल्पसंख्यक दलित और महिला सबसे गंभीर और पेचीदा मसले माने जाते हैं हर तरफ उनके संरक्षण और आरक्षण की बातें चलती रहती हैं। लेकिन इसके बावजूद सबसे ज़्यादा प्रताड़ित होने वालों में यही शुमार होते हैं। हर तरफ इनका ही हनन होता है और यह बात महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य है कि हजारों महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के बाद, दलितों की आत्महत्याओं के बाद अल्पसंख्यकों के हनन के बाद सरकार लाउडस्पीकर पर चिल्ला चिल्ला कर कहती है कि हम सरकार चलाने में सफल रहे हैं , हमने यह किया वह किया। हमें अगले पांच साल और दे दीजिए। हम सब जानते बूझते ऐसा कर भी आते हैं, वोट किसको, क्यों, और किस लिए दिया हमें नहीं पता बस किसी को तो देना था तो दे दिया, काम ख़तम!

जिस देश की संस्कृति और सभ्यता हमेशा से एकता की रही है, वही देश हिंदू-मुस्लिम, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, महिला-पुरुष आदि में क्यों बंटता रहता है? क्यों वसुधैवकुटुम्बकम् कहने वाले देश में लोग सिर्फ नागरिक नहीं, अपनी-अपनी प्रजाति से पहचाने जाते हैं? क्यों जिस देश का कानून लोगों का लोगों के द्वारा और लोगों के लिए बना है वहां लोगों के साथ ही इतना अन्याय होता है?

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