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पीरियड्स पर बात पिता के साथ !

पिताओं द्वारा अपनी बेटियों को अच्छे से जानना बेहद जरूरी है। बेटी के लिए भी यह एक अलग अनुभव होगा जो उसके जीवन और सोच को हमेशा के लिए बदल देगा ।

” पीरियड्स , महावारी , मासिक धर्म ” इन शब्दों से आज सभी भली-भांति परिचित हैं। साथ ही यह क्यों ,कब और किस प्रकार होता है , इसकी जानकारी भी सभी को है। आम तौर पर सभी महिलाओं को वो दिन हमेशा याद रहता है जब उन्हें पहली बार पीरियड्स होते हैं । उस समय सबसे पहले उन्हें मदद के लिए यदि ख्याल आता है तो वह कोई महिला ही होती है। फिर चाहे वह उसकी मां हो , बहन या कोई दोस्त हो। इस दौरान कहीं भी या किसी भी क्षण उसे किसी पुरुष का ख्याल नहीं आता , न अपने पिता का न भाई और न किसी अन्य साथी का । आखिर ऐसा क्यों ?

आज के बदलते हुए दौर में भी पीरियड्स को लेकर न केवल पुरुषों बल्कि महिलाओं के मन में वही पुरानी सोच है। उन्हें लगता है यह महिलाओं का निजी मामला है जिसका पुरूषों से कुछ लेना देना नहीं है। जबकि यह गलत है। जब एक आदमी अपने बच्चों के संपूर्ण जीवन के अच्छे बुरे समय में समान रूप से उनके साथ खड़ा रहता है तो फिर अपनी लडकी के युवा नारीत्व जीवन की शुरुआत में वह गायब क्यों दिखाई देता है? आखिर क्यों वे अपनी बेटियों के जीवन के इस आवश्यक हिस्से के बारे में बात करने से शरमाते हैं ? क्योंकि शायद यह सदियों से चली आ रही सोच का परिणाम है। 

सिर्फ खुद को एडवांस या आधुनिक बोल देने भर से कोई आधुनिक नहीं बन सकता । इसके लिए पुरानी सोच को बदलना और कभी कभी खत्म नहीं करना पड़ता है। हम अपने रोजमर्रा के जीवन में देखते हैं कि जब भी घर का अन्य कोई सामान (राशन या अन्य आवश्यक वस्तुएं) लाना हो तो पिता आसानी से बाजार जाकर हमें ला कर दे देते हैं। लेकिन ऐसे कितने पिता हैं जो एक केमिस्ट या अन्य दुकान से जाकर अपनी बेटी या पत्नी के लिए सैनिटरी नैपकिन खरीद कर लाते हैं ? या मासिक धर्म कप और टैम्पोन से होने वाले फायदों के बारे में चर्चा कर सकते हैं ? जिनकी वजह से उनकी बेटी अपने पीरियड्स के दौरान भी साधारण रूप से अपने दैनिक काम के सकें।मगर नहीं यह जिम्मेदारी केवल एक मां की ही बन कर रह गई है। 

इस डिजिटल दौर में सारी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध हैं । इसके बावजूद भी पुरुष कभी आकर अपनी बेटियों से इस बारे में बातचीत नहीं करते। उनसे उनकी मासिक स्वछता , दर्द , बहाव ,पीसीओडी और पीसीओएस जैसी गंभीर बीमारियों के बारे में कोई चर्चा नहीं करना चाहता।उन्हें लगता है कि यदि वो ऐसा कुछ करेंगे तो इससे वो खुद को और अपनी बेटी को असहज कर देंगे । इस समस्या से केवल उनकी मां ही अच्छी तरह निपट सकती है, जैसा कि अन्य हर किसी को लगता है।

मगर ऐसे भी अनेक परिवार हैं जहां अनेक कारणों jसे बच्चों को अपनी मां से अलग रहना पड़ता है। ऐसे में जरूरी है कि हमारा पुरुष वर्ग इस संकुचित सोच के दायरे से बाहर आए और अपनी बेटियों से इस बारे में बात करके उन्हें सहज करे। क्योंकि इस विषय पर एक महिला द्वारा कि गई बातचीत भी उतना ही गंभीर माहौल बनाती है जितना जब एक पुरुष इस विषय के बारे में बात करेगा ।

इसके लिए पिताओं या पुरुषों को सबसे पहले पूर्वाग्रहों और शर्मिंदगी से उबरने की आवश्यकता है। तभी वह सहज रूप से इस विषय पर चर्चा कर पाएंगे। और तभी वह अपनी बेटियों या अन्य महिलाओं की परेशानियों को समझ पाएंगे और उन्हें इलाज के सुझाव देने में सक्षम हो सकेंगे।

मासिक धर्म या पीरियड्स महिलाओं के जीवन का छुपा हुआ हिस्सा नहीं है। बस केवल इस विषय पर लोग खुल कर बात करने से कतराते हैं। यदि पुरुषों को भी शुरू से ही इस चर्चा का हिस्सा बनाया जाए तो वह आसानी से समझ सकेंगे की पीरियड्स के दौरान महिलाओं का कैसे ख्याल रखना है। महिलाएं या लड़कियां भी इस बात को लेकर तभी सहज हो सकती है जब उनके पिता या पति इस विषय में स्वयं आगे बढ़कर उनकी सहायता करें। इस पहल कि शुरुआत महिला के जीवन में आए सबसे पहले पुरुष से ही होनी चाहिए – जो कि उसके पिता है । 

क्योंकि जब माता पिता दोनों मिलकर अपने लड़के से यौवन जीवन के आरंभ और परेशानियों के बारे में चर्चा कर सकते हैं । फिर क्यों एक पिता अपनी लड़की को यह नहीं समझा सकता कि क्यों हर महीने उसे मासिक धर्म या पीरियड्स होते हैं और इस समय उसे क्यों ज्यादा से ज्यादा आराम करने को कहा जाता है ? हालांकि यह काम आसान नहीं है क्योंकि सदियों से माता पिता रूढ़िवादी सामाजिक शर्तों के साथ जीते आ रहे हैं। ऐसे में अचानक इन शर्तों को नकारा नहीं जा सकता । मगर एक पहल कि जा सकती है। धीरे धीरे इस स्थिति को सामान्य बनाया जा सकता है।

इसके लिए सबसे आवश्यक है हमें इस विषय पर चर्चा में घर के पुरुषों को भी शामिल करना होगा। क्योंकि किसी भी वास्तविक परिवर्तन कि शुरुआत हम घर से ही कर सकते हैं। पिताओं द्वारा अपनी बेटियों को अच्छे से जानना बेहद जरूरी है। बेटी के लिए भी यह एक अलग अनुभव होगा जो उसके जीवन और सोच को हमेशा के लिए बदल देगा ।क्योंकि पीरियड्स के बारे में केवल पढ़ना और फिर चुप रह जाना ठीक नहीं है। उन्हें अपनी जानकारी अपने बच्चों तक देनी होगी । उन्हें समझाना होगा कि यह डरने या शरमाने वाली चीज नहीं है और साथ ही यह बात पहले खुद समझनी होगी। ताकि उनके बच्चे उनके विश्वास और विश्वास कर सकें।

इसके साथ ही माता पिता और स्कूलों को साथ मिलकर बच्चों के भविष्य के बारे में सोचना होगा। स्कूल और घर पर सभी को इस बात का ख्याल रखना होगा कि बच्चे को उसकी उम्र के अनुसार होने वाले शरीर में मानसिक तथा शारीरिक परिवर्तनों के बारे में समय-समय पर जानकारी मिलती रहे। इसके लिए सबसे पहले स्कूल में यौन शिक्षा को अनिवार्य करना चाहिए। साथ ही इस विषय को किसी विशेषज्ञ द्वारा ही संभालना चाहिए। ताकि बच्चे इस विषय को बेहतरीन तरीके से समझ और सीख सकें ।

क्योंकि जब बच्चा किसी विषय को अच्छे से समझ जाता है तब उसके मन में एक विश्वास पैदा होता है । फिर वह उस विषय पर अपने माता-पिता से बात करने में नहीं कतराता ।इस विषय पर यू कैन फाउंडेशन ने एक ऑनलाइन सेमिनार का आयोजन भी किया था । जिसमे आमंत्रित सभी वक्ताओं ने इस विषय कि गंभीरता और अनिवार्यता को बड़े ही सहजता के साथ समझाया था।

फिनलैंड देश में यौन शिक्षा को स्कूल में अनिवार्य कर दिया गया है। ऐसे ही अनेक और भी देश हैं जहां यों शिक्षा पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा है। वहां के बच्चों के माता पिता के  भी इन विषयों पर काफी खुले विचार रखते हैं। हमें भी स्कूल और घर पर अपने बच्चों को इस विषय पर समझाना चाहिए। आज के डिजिटल दौर में हर माता पिता को यह चिंता होती है कि उनका बच्चा मोबाइल फोन पर या कंप्यूटर पर किस तरह की जानकारी प्राप्त कर रहा है। इसलिए आवश्यक है कि बच्चों को इस बात का ज्ञान हो कि उनके लिए इस ऑनलाइन दुनिया में कौनसी जानकारी किस समय जरूरी है।

यह तभी हो सकता है जब माता पिता और स्कूल स्वयं यौन शिक्षा को लेकर आश्वस्त हो। साथ ही स्कूल में होने वाले इस विषय से संबधित आयोजनों में स्कूल विभाग को माता पिता को भी शामिल करना चाहिए । ताकि स्कूल और घर दोनों स्थान पर बच्चा समान जानकारी प्राप्त कर सके। इसी प्रकार हम बच्चों तथा माता पिता के मन में इन बातों को लेकर विश्वास पैदा कर सकते हैं। उन्हें शर्म और समाज के पूर्वाग्रहों से उबरने में सहायता कर सकते हैं।ताकि उन्हें इस दुनिया में एक स्वस्थ शारीरिक और मानसिक माहौल प्राप्त हो सके । 

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