in , , ,

शिक्षा क्षेत्र की बदलती गतिशीलता – यू कैन फाऊंडेशन द्वारा आयोजित तीसरा ऑनलाइन वेबिनार

शिक्षा एक समग्र विकास है। यह न केवल अच्छा बोलने में मदद करता है बल्कि अच्छा व्यवहार करने में मदद भी करती है। यह हमें सही और गलत के बीच अंतर करने में मदद करती है।

11 जुलाई, 2020 को यू कैन फाउंडेशन ने “शिक्षा क्षेत्र की बदलती गतिशीलता” के विषय पर वेबिनार का आयोजन किया। पैनल में देश के विभिन्न हिस्सों से 6 उच्च सम्मानित शिक्षाविद शामिल थे। सत्र के लिए मध्यस्थ यू कैन फाउंडेशन के संस्थापक मोनिस शम्सी थे।

सत्र की शुरुआत सभी पैनलिस्टों के परिचय के साथ हुई। एम.एस. रहमान, कोसी वैली इंटरनेशनल (बिहार) के निदेशक, डाॅ. नीरा शर्मा डीएवी पब्लिक स्कूल (पंजाब) की प्रिंसिपल, डॉ. कुनाल आनंद, दिल्ली पब्लिक स्कूल (J&K) के प्रिंसिपल, डॉ प्रीति ओझा, दिल्ली इंटरनेशनल स्कूल (दिल्ली) के प्रिंसिपल, सुश्री कविता सांघवी, एसवीकेएम के चतर्भुज नरसी मेमोरियल स्कूल (महाराष्ट्र) की प्राचार्य और श्री मुस्तफा मजीद,सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, हरियाणा के प्रिंसिपल।

मध्यस्थ ने पैनलिस्टों से सबसे पहला सवाल यह पूछा कि उनके जीवन में शिक्षा की भूमिका क्या थी। डॉ. प्रीति ने कहा कि शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं है। हमें पाठ्यपुस्तकों से जुड़ना और आगे बढ़ना चाहिए। शिक्षा का मतलब विफलताओं की खोज और जश्न मनाना चाहिए। जब तक बच्चा खुद से चीजों को अनुभव नहीं करेगा उसे पता नहीं लगेगा कि वह किस चीज में अच्छा प्रदर्शन कर सकता है। इसलिए आवश्यक है कि बच्चे अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी काबिलियत को आजमाएं जिससे उन्हें यह अनुभव हो सके की वह किस विषय में माहिर है और उन्हें किस क्षेत्र की तरफ जाना चाहिए।

 श्री रहमान ने कहा कि शिक्षा एक मानव-निर्माण प्रक्रिया है। यह हमें एक अच्छे इंसान के रूप में ढालता है। श्रीमती नीरा ने कहा की शिक्षा जीवन भर सीखने की प्रक्रिया है। यह बच्चे के जन्म होने के समय से ही शुरू हो जाती हैं। हम चारों ओर से शिक्षा के विभिन्न रूपों से घिरे हुए हैं।

मध्यस्थ द्वारा यह पूछे जाने पर कि शिक्षा ने आपके व्यक्तित्व को कैसे बदल दिया है, डॉ. कुनाल आनंद ने कहा कि शिक्षा एक समग्र विकास है। यह न केवल अच्छा बोलने में मदद करता है बल्कि अच्छा व्यवहार करने में मदद भी करती है। यह हमें सही और गलत के बीच अंतर करने में मदद करती है। अपने व्यक्तिगत अनुभव के बारे में, उन्होंने कहा कि शिक्षा ने उन्हें बदल दिया है। वह खुद को एक शिक्षाविद् के रूप में नहीं बल्कि एक शिक्षार्थी के रूप में मानते है। शिक्षा ने उसे सिखाया है कि वह कैसे अंतर करना और समझना चाहता है कि वह क्या चाहता है। इसी के उत्तर में श्री मुस्तफा ने कहा कि शिक्षा हमें अच्छे इंसान बनाती है। जब हम खुद को शिक्षित करते हैं, तो हम कहीं ना कहीं खुद के जीवन में बदलाव लाते हैं। उन्होंने शिक्षा को सभी के लिए अनिवार्य करने पर जोर दिया।

इस सवाल का जवाब देते हुए कि उनका अनुभव शिक्षा के साथ कैसा रहा है, सुश्री कविता ने बताया कि शिक्षा ने उन्हें सशक्त बनाया है। यह हमें एक अलग स्तर पर ले जाती है जहाँ हम जीवन को बदल सकते हैं। अनुभवात्मक शिक्षण के बारे में बात करते हुए, डॉ. प्रीति ने स्पष्ट किया कि कोई भी शिक्षा लचीलेपन के साथ अनुभवात्मक बन जाती है। आजकल, बच्चों को सब कुछ पहले से तैयार मिलने की आदत इस हद तक बढ़ गई है कि यह बच्चों को विभिन्न प्रकार के अनुभव को महसूस करने से रोक रही है। पैनल में एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी उठाया गया था कि अनुभवात्मक सीखने के बारे में मुख्य बात प्रतिबिंब है।अर्थात् उस शिक्षा का कोई महत्व ही नहीं है जिसका बच्चों के मन और सोच पर कोई असर ही न दिखाई दे।

बच्चों के बीच निर्णय लेने की जो दूरी बनती जा रही है इस के बारे में बात करते हुए, श्री रहमान ने कहा कि माता-पिता और शिक्षकों को सक्रिय होना चाहिए। बच्चों को विभिन्न शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक  की गतिविधियों से अवगत कराया जाना चाहिए। ध्यान केंद्रित कौशल-आधारित विषयों को सीखने पर दिया जाना चाहिए।

महत्वपूर्ण सोच को सक्षम करने में स्कूल की भूमिका पर चर्चा करते हुए, श्री मुस्तफा ने कहा कि माता-पिता अपने बच्चे को निर्णय लेने से डरते हैं।उन्हें पहले से ही डर लगता है कि कहीं इनके बच्चे का कोई फैसला गलत साबित न हो जाए। कहीं बच्चे हर न जाए या कुछ गलत न कर ले। जबकि बच्चों में निर्णय लेने की आदत बचपन से ही होनी चाहिए।

श्री मुस्तफा ने कहा कि स्कूल ही एक ऐसी जगह है जहाँ एक बच्चे को अपने दम पर फैसले लेने का मौका मिलता है।इसलिए बच्चों को खुलने का सबसे अधिक प्रभावित अवसर स्कूल में ही मिलता है। माता पिता को चाहिए कि वह अपने बच्चे को खुद निर्णय लेने दे और बच्चे के लिए एक विश्वास का स्तम्भ बने।

स्कूल में सिखाए जाने वाले विषयों को केवल कक्षा में पढ़ाने और वास्तविक जीवन में लागू करने में कितना अंतर है इस सवाल के जवाब में डाॅ कुनाल ने बताया कि स्कूल का टाइम टेबल कुछ इस प्रकार का होता है कि अध्यापक को एक निश्चित समय में अपना विषय पूरा कराना होता है। इसकी जल्दी में अध्यापक इस बात को नजरंदाज के देते हैं कि जो बच्चों को किताबी ज्ञान दिया जा रहा है , वह अपने वास्तविक जीवन में उन्हें कितना लागू करता है ।

यू कैन फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड के सदस्य अविजीत चक्रवर्ती के सवाल का जवाब देते हुए डॉ कुनाल ने कहा कि ऐसे समय में जब सूचनाओं की अधिकता होती है, यह स्कूल की जिम्मेदारी है कि वह छात्रों को सही और गलत के बारे में बताए। उनके दूसरे सवाल का जवाब देते  हुए, डॉ. प्रीति ने कहा कि शिक्षकों को मन की सीमा को उजागर करना चाहिए और बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए।साथ ही हमें माता पिता के साथ मिलकर इस विषय पर काम करना चाहिए।ताकि बच्चे इस तकनीकी युग में खुद अपने फैसले ले सकें। कविता जी के अनुसार इस लॉकडाउन के दौर में अध्यापकों ने काफी मेहनत की है। अध्यापकों ने भी इस समय में एक योद्धा कि तरह भूमिका निभाई।

डॉ नीरा के अनुसार एक अध्यापक का मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्व रखता है जितना कि एक बच्चे का। यदि एक अध्यापक खुश नहीं है तो वह अपने विचार अपनी कक्षा में नहीं रख पाएंगे । इसलिए आवश्यक है कि हम बच्चों के साथ साथ अध्यापकों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान दें। एम. एस. रहमान ने भी इसी के संदर्भ में कहा कि जब भी किसी अध्यापक की कोई समस्या होती है तो उसे बड़े ही नाजुकता के साथ संभालना चाहिए। हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि एक अध्यापक की मानसिक स्थिति सकारात्मक बनी रहे।

सत्र सभी पैनलिस्टों के धन्यवाद शब्दों के साथ समाप्त हो गया और एक अद्वितीय और प्रासंगिक सत्र के लिए मध्यस्थ को सभी ने धन्यवाद दिया। 

वॉइस ऑफ मार्जिन ने कई मौकों पर यू कैन फाऊंडेशन के साथ सहयोग किया है।

What do you think?

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0

Comments

0 comments