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राम नाम सत्य है

रावण का साध्य अधर्म था. हमारी हालत तो रावण से बहुत ख़राब है. साधन और साधना दोनों हम जुटा नहीं पाते और साध्य की तो बात ही छोड़ दीजिए.

तुमने जहाँ लिखा है ‘प्यार’
वहां लिख दो ‘सड़क’
फ़र्क़ नहीं पड़ता
मेरे युग का मुहावरा है

फ़र्क़ नहीं पड़ता
अक्सर महसूस होता है
कि बग़ल में बैठे हुए दोस्तों के चेहरे
और अफ्रीका की धुंधली नदियों के छोर
एक हो गए हैं

और भाषा जो मैं बोलना चाहता हूँ
मेरी जिह्वा पर नहीं बल्कि दांतों के बीच
की जगहों में
सटी हुई है

मैं बहस शुरू तो करूँ
पर चीज़ें एक ऐसे दौर से गुज़र रही हैं
की सामने की मेज़ को
सीधे मेज़ कहना

उसे वहां से उठाकर
अज्ञात अपराधियों के बीच रख देना है

केदारनाथ सिंह

भगवान राम, विराट कोहली और Parle G बिस्कुट में क्या समानता है?

सवाल अटपटा जरूर हो, मुश्किल बिलकुल नहीं है. इन तीनों में यही समानता है की इन्हें भारत में खूब पसंद किया जाता है. पसंद आना आज के दौर की पहली और आखिरी कसौटी है. सड़क से लेकर कोर्ट तक सारे विचार, भाषाएं, दर्शन और दलीलें अब पसंद और नापसंद के महाविचार के भीतर ही घटते हैं. सुपरमार्केट (supermarket) में साबुन और भगवान दोनों मिलते हैं, अपनी पसंद के अनुसार दोनों का चुनाव करने की आपको पूरी आज़ादी है.

बस एक पाबंदी है. पसंद और नापसंद का आधार पूछना सख्त मना है. पसंद का आधार पसंद ही है. लेकिन ये सवाल पूछने का पाप अगर आपने किया तो कुछ मज़ेदार नतीजे आपको प्राप्त हो सकते हैं. Parle G और साबुन को पसंद करने का आधार बताने में लोग शायद आपको 4-5 वैज्ञानिक या अर्ध-वैज्ञानिक तथ्य बता दें. “बस अच्छा लगता है” की बारी इन 4-5 तथ्यों के बाद आएगी. विराट कोहली के मामले में शायद ये तथ्य 1-2 तक सीमित हो जाएँ. विराट कोहली को पसंद करने का कारण उनकी अच्छी बैटिंग और बैटिंग को पसंद करने का कारण क्रिकेट को पसंद करना. क्रिकेट को पसंद करने के सवाल पे शायद “बस अच्छा लगता है” की वापसी हो जाए. कुछ लोग शायद उससे भी एक दो सवाल आगे पहुँच जाएँ.

भगवान राम को पसंद करने की कहानी बहुत विकट है. आसान जवाब यह है की वो भगवान हैं, इसलिए पसंद हैं. अब भला भगवान को नापसंद करने का दुस्साहस कोई करे भी तो क्यों. लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है.

पसंद और नापसंद का आधार आसमान से हमारे चित्त में नहीं टपकता. वो ढलता या ढाला जाता है. जो लोग दुनिया को देख परख के अपनी समझ बनाते हैं, वो साथ ही साथ अपनी पसंद नापसंद के आधार को भी शिल्पकार की तरह खूब मेहनत कर ढालते हैं. उनकी पसदं नापसंद के आधार का साँचा मेहनती हाथों से तराशा गया सटीक और बारीक होता है जो दुनिया और जीवन कि गहरी समझ से निश्चित किया जाता है. वहीं जो जीवन ही निरर्थक हो, उसमे पसंद नापसंद का आधार भी निरर्थकता के बल से ही ढलता है. इन दो विपरीत जीवनों में भी पसंद नापसंद विपरीत हो ये बिल्कुल जरुरी नहीं है. गांधीजी को Singer कंपनी की सिलाई मशीन खूब पसंद थी क्यूंकि वो उस निर्जीव मशीन में सर्वोदय की ताकत देख पाते थे. किसी चोर को भी ये मशीन पसंद आ सकती है जिसमें उसे शायद कुछ पैसे नज़र आएं.

राम को पसंद करने के भी लाखों कारण होंगे. हाल ही में एक Documentary Film देख रहा था, मोती बाग़. फिल्म उत्तराखंड के पौरी गढ़वाल में रहने वाले एक किसान, विद्या दत्त के जीवन को दर्शाती है. फिल्म में एक जगह विद्या दत्त कहते हैं की तुम्हारे राम रहते होंगे केदारनाथ बद्रीनाथ में, मेरे राम तो मेरे खेत में ही रहते हैं. जाहिर है विद्या दत्त राम को पसंद करते हैं. शायद उनके राम को पसंद करने का आधार राम के जीवन की सत्यता और धर्म-प्रियता है. अपनी कर्मठता में राम का प्रतिबिम्ब देख कर उन्होंने अपने जीवन की सार्थकता बढ़ा ली होगी. बद्रीनाथ केदारनाथ और बांकी सब धाम जाने वाले लोगों में भी ऐसे कई लोग होंगे जिन्होंने राम के नाम को अपने जीवन में पिरोकर उसे कुछ अधिक अलंकृत किया होगा. ऐसे लोग हमेशा तार्किक सिद्धांतों और गहन अध्ययन कर के ही जीवन को सार्थक बनाते हों ये जरुरी नहीं है. आत्मा का परमात्मा से योग कराने के लिए तो कितने ही मार्ग प्रशस्त किये गए हैं. ज्ञान, भक्ति, कर्म और राज तो बस इस योग को साधने के कुछ मुख्य प्रकार हैं. पर इनमें से किसी भी मार्ग पर चलने के लिए अनिवार्य है साध्य, साधन और साधना की एकता. रावण की ना तो साधना में कमी थी, ना ज्ञान के साधन की उसे कोई कमी थी. लेकिन उसका साध्य अधर्म था. सो उसका नाश निश्चित था. हमारी हालत तो रावण से बहुत ख़राब है. साधन और साधना दोनों हम जुटा नहीं पाते और साध्य की तो बात ही छोड़ दीजिए.

इस लेख की शुरुआत में उठाए गए प्रश्न के बारे में एक और बात कही जा सकती है. बिस्कुट हम सब खाते हैं. वो उपयोग की वस्तु है. विराट कोहली और क्रिकेट से हमे मनोरंजन मिलता है सो उन्हें भी उपयोग या उपभोग का पात्र मानने में कोई दिक्कत नहीं है. इसके ऊपर ज्यों ही हम ऐसी चीज़ों की बात करने लगें जिनसे हमारा रोज़मर्रा का कोई नाता नहीं, तो बात बहुत जल्दी हमारे अहम की बन के समाप्त हो जाती है. इसलिए राम, भारत माता, गाय और हिंदी, सबको पसंद करने का आजकल एकमात्र अभद्र आधार बच गया है. अहम. क्यूंकि इन में से किसी से भी हमारा कोई रिश्ता बचा नहीं है सो हमने एक नया रिश्ता गढ़ लिया है, ठेकेदार का. राम को पसंद करने का आधार है ठेकेदारी बढ़ा के छाती पीटना.

इन ठेकेदारों की किस्मत भी कितनी अच्छी है. भारत जैसे प्राचीन कथा संपन्न देश में बालू की ठेकेदारी से भी आसान है सभ्यता की ठेकेदारी.

लेकिन ये ठेकेदारी कोई 2014 में शुरू हुई हो ऐसा भी नहीं है. बात बस इतनी है की अभी तक इस ठेकेदारी में नेताओं का एकाधिकार था. आधुनिकता की होर में जिस भी चीज़ का नाता समाज और व्यक्ति के अस्तित्व से टूटता गया, कबाड़ी नेता उसे उठा कर उसकी नीलामी करने लगे. जिसे भी अपना व्यक्तित्व कुछ कमजोर या जीवन उदासीन लगता हो, वो इन मुद्दों को अपने वोट से खरीदकर, समाज में अपना नाम बढ़ा सकता था. शुरुआत में तो भारत की इतनी ख़राब हालत थी की रोटी, कपडा, मकान की जद्दोजहद में ही बहुत समय बीत गया. ठेकेदारों का धंधा चला लेकिन सीमित रूप से. जीवन की मूल जरूरतें पूरी होते ही व्यक्तित्व सवारने की चिंता सामने आ जाती है सो अब जब एक पीढ़ी के आर्थिक कदम कुछ जमे हैं, तो वो और उनकी अगली पीढ़ी भी व्यक्तित्व के बाज़ार में आए है. व्यक्तित्व सवारने की चिंता को और बल मिला वैश्वीकरण के प्रभाव से जब दौड़ में पीछे छूट गए या ज्यादा आगे चले गए लोगों को Soft Power नाम की देवी के दर्शन हुए.

ठेकेदारी का ये धंधा तो बहुत पुराना है लेकिन राम मंदिर का शिलान्यास सच में ऐतिहासिक है. राम मंदिर सामाजिक स्तर पे भारतीयता की समाधी है. “सामाजिक स्तर” कहना जरुरी है क्यूंकि भारतीयता कोई विचारधारा नहीं है जो दूसरे विचार से हार के लुप्त हो जाए. दरअसल हारने जीतने का ये पूरा कार्यक्रम किसी और संस्कृति से उधार लिया गया है. इसका सबसे अच्छा नमूना तो अयोध्या खुद है. जिससे युद्ध नहीं किया जा सकता उसी का तो नाम अयोध्या है. विनोबा ने कहा है कि वेदों में युद्ध का एक नाम ‘मम सत्य’ भी है. मेरा सत्य. अयोध्या में मम सत्य का कोई काम नहीं क्यूंकि वहां सत्य का ही शासन है. पूर्ण सत्य. अयोध्या भारतीयता का प्रतीक है और राम मंदिर अयोध्या की भूमि पर उधार कि संस्कृति का कलंक.

लेकिन ये उधार की संस्कृति कौन सी है?

दरअसल ये संस्कृति अंग्रेज़ों की भारत पे आखिरी मेहरबानी थी. ये चीज़ों को परिभाषाओं में समेटने और उन परिभाषाओं को संगठित कर उन्हें कृत्रिम एकता में बांधने की संस्कृति है. लेकिन इन सब के ऊपर, ये संस्कृति है तुलनात्मक विकास ही. राम मंदिर को लेके होने वाली बहसों में कितनी बार सुना की जब यरुशलम (Jerusalem) और मक्का (Mecca) में इसाईओं और मुसलमानों का ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है तो हिन्दुओं का कोई एक मुख्य ऐतिहासिक धार्मिक स्थल होना ही चाहिए. कल्पना की ऐसी दरिद्रता पे क्या कहा जाए. जिसमें अपनी चीज़ तब तक अच्छी नहीं लगती जबतक वो दूसरे की चीज़ की घटिया नकल (copy) ना बन जाए. ऐसा तभी होता है जब व्यक्ति में कोई आत्मबोध ना बच गया हो और वो दासत्व में इतना क्षीण हो जाए की उसे बस अपने स्वामी जैसा बनने में ही मुक्ति दिखाई दे.

अंग्रेजी के शब्द ‘Religion’ का एक को छोड़, किसी भारतीय भाषा में कोई अनुवाद नहीं है. जिस एक भाषा में है वो भाषा उर्दू है जिसमे मजहब शब्द religion के आस पास का शब्द मालूम पड़ता है. इसका कारण यह है की उर्दू का विकास भारत में इस्लाम के आने के बाद हुआ लेकिन इसका ये मतलब बिल्कुल ना समझें की उर्दू मुसलमानों की भाषा है. उर्दू तो शायद दुनिया की पहली ऐसी भाषा है जिसका जन्म ही रूढ़िवाद के विरोध में हुआ. हिंदी में जिस शब्द को हमने religion का अनुवाद मान लिया है उसका तो मज़हब से कोई लेना देना ही नहीं है. धर्म तो भारतीय विचार का एक अद्धभुत नमूना है जो खुद में ना जाने कितनी पोथियों का दर्शन समेटे हुए है. यदि हम इसका उपयोग मज़हब के पर्याय के रूप में करते हैं तो इसका पूरा श्रेय अंग्रेज़ों को जाता है जिन्हें हर चीज़ को परिभाषित और श्रेणीबद्ध करने की अजीब आदत थी. सो जो बात उनके पल्ले नहीं पड़ी, उन्होंने उसे अपनी समझ के अनुसार निकटतम अंग्रेजी शब्द का पर्याय घोषित कर दिया. समस्या यह थी की भारतीय लोगों ने भी इन उल जलूल परिभाषाओं को ही सभ्यता का परिचायक समझा.

इसी विचार में मदहोश कुछ लोगों ने हिन्दू संस्कृति का बाकी संस्कृतियों की नक़ल में विकास करने की ठानी और कथाओं और कल्पनाओं की सुंदर दुनिया का तिरस्कार कर उसे सरकारी इतिहास के भद्दे सांचों में अटाने का प्रयास करने लगे.

भारत राष्ट्र तो बांकी राष्ट्रों की तुलना में अभी नाबालिग है। लेकिन भारतीय सभय्ता बहुत पुरानी है. सभ्यताओं की कल्पना कुछ कुछ एक विशाल महल जैसी है। ऐसा महल जो कुछ मूल विचारों के स्तंभ पे खड़ा है। जब ये वैचारिक स्तम्भ खोखले होने लगे तो मिश्र और यूनान जैसी महान सभ्यताओं का नाश हो गया। ऐसा माना जाता है की भारत की सभ्यता आज तक अटूट है। उसके स्तंभों की मरम्मत करने वाले कर सेवकों ने इन स्तंभों को मजबूत बनाए रखा है। लेकिन इन विचारों ने इतना लंबा सफर तय किया है तो इनको समझने में गलती भी हो ही सकती है. आपने वो कथा तो सुनी ही होगी जिसमे लोगों की आँखों पर पट्टी बाँध कर उन्हें हाथी के पास ले जाया जाता है. जिसके हाँथ में हाथी की पूँछ जाती है वो हाथी को रस्सी कह देता है और पैर पकड़े बैठा इंसान उसे स्तंभ कह देता है. सो इतनी पुरानी सभ्यता के विचारों के स्तंभों के विश्लेषण में भूल तो हो ही सकती है.

सभ्यता से इतर भी एक सुंदर दर्शन है भारत को एक कल्पना की तरह देखने का। कल्पना भी ऐसी जो न जाने कितनी कल्पनाओं को खुद में समेटे है। ऐसे की कोई कल्पना दूसरी से टकराती नहीं है। किसी कल्पना का दूसरे से कोई विरोध नहीं है। कल्पना महलों में कैद नहीं होती जहां ज्यादा कल्पनाएं आ जाएं तो सांस लेने में दिक्कत होने लगे। कल्पना स्तंभों पर खड़ी भी नहीं होती जो खोखले हो जाएं तो कल्पना ढरढराकर गिर पड़े। कल्पना कल्पनाओं के स्तंभ पे ही खड़ी होती है। वो गिरती तभी है जब एक समाज की सामूहिक कल्पना दम तोड़ दे और वो घटिया नीरस दोहराव के जंजाल में लुप्त हो जाए।

स्तंभ ना होने का मतलब ये बिल्कुल नहीं है की कल्पना का कोई आधार नहीं है। कल्पना का आधार जीवन है। जीवन की स्वछंदता है।

स्तंभ टूट जाने पर उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। कल्पना को कभी भी खोजा जा सकता है। किताबों में, नदियों में, गुम्बदों में, गिलहरियों में भी। आप ढूंढेंगे तो आपको भारत जरूर मिलेगा. अपने अंदर हज़ारों भारत समेटे किसी रेलवे प्लेटफॉर्म पे खड़ी है एक ट्रेन, हज़ारों मील खड़ी दूसरी ट्रेन से बिलकुल बेखबर लेकिन वो दोनों ट्रेनें कभी टकराती नहीं, बस गुज़रते हुए कहती हैं एक दूसरे से ‘राम राम’.

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