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बलात्कार प्रथा

समाज की नजर में यह ऐसी घटना है जिसमें स्त्री का अस्तित्व नष्ट हो जाता है और उसके लिए जीने से बेहतर है मर जाना। क्योंकि उसका स्त्रित्व भंग हो चुका है।

Source : The Indian Feed

प्रथा

‘प्रथा’ एक ऐसा शब्द है जो समाज में व्यापत किसी परंपरा या परिपाटी की ओर संकेत करता है। अर्थात् कोई ऐसा कार्य जो समाज में एक लंबे समय से चलता आरहा है। ऐसे में ‘दुष्कर्म’, ‘बलात्कार’, ‘रेप’ आदि शब्द भी हमारे लिए कोई नए नहीं है। अतः यह अपराध/घटना भी एक लंबे समय से हमारे समाज में फ़ैली हुई है। यदि इसके साथ सामूहिक शब्द जोड़ दें तो इसमें केवल एक घटना के दोषियों की संख्या बढ़ जाती है। ऐसे में इस कुरीति को भी प्रथा की श्रेणी देना गलत न होगा। अर्थात इसे बलात्कार प्रथा कहना अनुचित नहीं होगा।

इस शब्द की व्याख्या नहीं की जा सकती। समाज की नजर में यह ऐसी घटना है जिसमें स्त्री का अस्तित्व नष्ट हो जाता है और उसके लिए जीने से बेहतर है मर जाना। क्योंकि उसका स्त्रित्व भंग हो चुका है। मेडिकल दृष्टिकोण में यह एक ऐसी घटना है जहाँ महिला से उसकी मर्जी के विरुद्ध उसके साथ शारीरिक संबंध बनाये जाते हैं और उसे प्रताड़ित किया जाता है। ऐसे ही इस शब्द के मायने अलग अलग लोगों के लिए भी अलग अलग हैं। किंतु समस्या यह एक ही है।

बहुचर्चित मामले

16 दिसंबर 2012 की रात और दिल्ली का नाम जब एक साथ सामने आता है तो, केवल एक ही किस्सा ज़हन में उभर कर आता है – निर्भया गैंगरेप मामला। हालांकि इस घटना को हुए लगभग आठ साल बीत गए । किंतु निर्भया मामले में देरी से हुए इंसाफ ने इस घटना को आजतक लोगों के मन से नहीं उतरने दिया था। आज के युवा वर्ग के लिए यह पहली ऐसी घटना होगी जब उन्होंने बलात्कार और उसकी भयानकता के बारे में सुना होगा।

1973 में हुआ देश का पहला और सबसे चिर्चित रेप केस अरुणा शानबाग रेप केस माना जाता है। उसके बाद तो जैसे बलात्कार प्रथा ही शुरू हो गयी। जिसने भारत की सभ्य समाज की छवि को रौंद दिया। इसके बाद एक एक करके ऐसे ऐसे मामलों की खबर सुनने को मिली, जिनसे लोगों की रूह कांप उठे। 1996 प्रियदर्शिनी मट्टू रेप मामला, 1999 अंजना मिश्रा रेप केस, सौम्या रेप केस, 2015 में मुंबई में महिला पत्रकार गैंगरेप केस, 1992 राजस्थान भंवरी देवी रेप केस, 2018 कठुआ रेप केस, 2019 प्रियंका रेड्डी रेप केस और न जाने ऐसे कितने ही अनगिनत मामले हैं, जहाँ न केवल महिलाओं बल्कि मासूम बच्चियों को इस बलात्कार प्रथा का शिकार होना पड़ा।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिदिन लगभग 50 बलात्कार के मामले थानों में दर्ज होते हैं। इस प्रकार भारत में प्रत्येक घंटे दो महिलाएं इस घटना का शिकार होती हैं। लेकिन आंकड़ों की कहानी पूरी सच्चाई बयां नहीं करती।क्योंकि बहुत सारे मामले ऐसे हैं, जिनकी रिपोर्ट ही नहीं हो पाती।

जिस तरह बलात्कार के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है और यह बीमार मानसिकता समाज में फैल रही है, ऐसे में इसे बलात्कार प्रथा का नाम देना गलत न होगा। क्योंकि आज तक जितने भी अपराध महिलाओं के खिलाफ होते आए हैं, सभी को एक प्रथा माना गया। ये प्रथाएँ समाज की संकुचित सोच, जो महिलाओं को केवल दबा कर रखने और उन्हें केवल उपभोग वस्तु समझती है, के कारण जन्म लेती है।

क्योंकि हमने कभी नहीं सुना की इसी कोई प्रथा हमारे समाज में है, जो महिलाओं के हित में है। बाल विवाह से लेकर सती प्रथा और इन जैसी अनेक प्रथाएँ केवल नारी जीवन को कष्टों से भरती थी, जो आज भी पूर्णतः समाप्त नहीं हुई हैं(आज भी अनेक पिछड़े इलाकों में मौजूद हैं)।

समाज की सोच

जब भी देश में किसी बेटी या महिला के साथ दुष्कर्म होता है तो सभी लोग उन अपराधियों को कोसते हैं। मन में भला-बुरा बोलते हैं, बद्दुआयें देते हैं। मगर उसके बाद क्या? अपने दैनिक कार्यों में लग जाते हैं। ज्यादा से ज्यादा कैंडल मार्च निकालते हैं, दोषियों के लिए फांसी की मांग करते हैं…

मगर क्या दोषियों को फांसी देने से लोगों की सोच बदल जायेगी?

क्या उसके बाद कोई महिला या बच्ची इस पीड़ा का शिकार नहीं होगी?

नहीं!

क्योंकि दोषियों को फांसी देने से सिर्फ दोषी खत्म होंगे दोष नहीं। और यह बलात्कार का दोष मनुष्य के शरीर में नहीं है, अपितु उस समाज की सोच में है, जहाँ वह रहता है। अगर केवल दोषियों को फांसी देने से यह अपराध खत्म हो सकता तो निर्भया केस में हुए फैसले के बाद देश में एक भी रेप केस नहीं होना चाहिए था। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसके बाद भी लगातार रेप के आंकड़े बढ़ते रहे हैं।

आंकड़ों की माने तो 95% आरोपी पीड़ित के जानकार पाए जाते हैं और हर चौथी पीड़िता नाबालिग होती है। ऐसे में यह कहना भी कहाँ तक उचित रह जाता है की लड़कियाँ घर में अपनों के बीच सुरक्षित हैं। या ऐसी घटना केवल उन्हीं के साथ होती हैं जो ज्यादा बाहर घूमती है और देर तक बाहर ही रहती हैं। क्योंकि खबरें तो 3 महीने की नवजात बच्ची के बलात्कार की भी आई थी। इतना ही नहीं खुद के पिता, मामा, चाचा, रिश्तेदार द्वारा दुष्कर्म करने की खबरें भी हर रोज समाचारों के किसी हिस्से में देखने और सुनने को मिल ही जाती है।

अतः इस समाज में फ़ैली इस असभ्य प्रथा को समाप्त करने के लिए केवल बलात्कार संबंधी नियम बनाने या सजा निर्धारित करने से यह प्रथा समाप्त नहीं हो सकती। इसके लिए समाज में फैली अन्य संकुचित धारणाओं ( बाल विवाह) और अपराधों (कन्या भ्रूण हत्या) को जड़ से समाप्त करना होगा। हालांकि इस जघन्य अपराध के लिए सजा अति आवश्यक है और होनी भी चाहिए। लेकिन केवल सजा देने से यह अपराध समाप्त नहीं हो सकता।

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