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समाज का तथाकथित अंधा

भारतीय समाज की आँखों पर पड़ी धर्म और संप्रदाय की पट्टी ने इंसान को अंधा बना दिया है। ऐसे में व्यक्ति को उसकी विकलांगता के कारण अंधा कहना और उसे इस बात का एहसास दिलाना व्यर्थ है। वास्तव में इन धर्म के अंधों को इस बात का एहसास दिलाना आज के समय में सबसे अधिक जरूरी है।

एक बार एक अंधे आदमी की मुलाकात एक सरकारी दफ्तर में काम करने वाले अफ़सर से हो गयी।

दोनों खूब गप्पे मारते। फिर एक दिन अंधे ने पूछा ये शोर कैसा है, अफ़सर ने कहा…  लगता है कोई बड़ा व्यक्ति आने वाला है।

अंधे  ने फिर पूछा, कोई कलाकार है क्या ?

अफ़सर ने कहा नहीं शायद कोई नेता है , आया होगा कोई भाषण वाशन  देने ।

तुम्हारी आंखे होती तो दिखाता क्या शान से जीते है ये नेता .. खैर !

कुछ दिन बाद दोनो एक कॉफी शॉप पर गये,अफ़सर बाबू की तरक्की की खुशी में।

फिर शोर हुआ, अंधे ने फिर पूछा, क्या हुआ है ?

अफ़सर ने कहा लगता है कोई बड़ा कलाकार आया है

ज़िंदगी हो तो इनके जैसी, इसे कहते हैं असल में जीना

तुम्हारी आंखे होती तो दिखाता क्या शान से जीते है ये कलाकार .. खैर !

लाल बत्ती के पास खड़ा होकर अंधा व्यक्ति आज अफ़सर का इंतज़ार कर रहा था की इतने में भीड़ की एक लहर सी आयी और अंधे को साथ ले जाने लगी। भीड़ से, मारो इसे, छोड़ना मत, ऐसी आवाज़ें आने लगी।किसी ने अफ़वाह फैला दी थी की अब्दुल ने श्री राम का नारा लगाने से मना कर दिया है। फिर क्या, ये भारत है यहां भगवान का नाम ना लेने से ज़्यादा खतरनाक आपका अब्दुल होना है। उसके चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी। इतने में अफ़सर ने अंधे को एक किनारे खींचते  हुए उसे एक किनारे में खड़ा किया।

अंधा बोला अरे तू आ गया ?

अफ़सर बोला हां, पता नहीं क्या ड्रामा है ये , नॉनसेंस

… चल चाय पीते हैं

अंधे  ने बोला ..  कुछ कहना चाहता हूँ में

तुम हमेशा कहते हो की मेरी आंखे होती तो ये दिखाते, वो दिखाते, पर आज मुझे पाता चला असल में अंधे तो तुम हो

जो समाज की सच्चाई को ड्रामा कहते हो और ड्रामा को सच्चाई।

कहकर अंधे ने अपने कदम सच्चाई की ओर बढ़ा दिये।

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