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भारतीय गणतन्त्र में आने वाला समय डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवाद का है

वे एक महान व्यक्तित्व के धनी होने के साथ-साथ एक महान समाज सुधारक भी थे। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर देश समाज के नव निर्माण में सभी को योगदान देना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य इन तीनों शब्दों के अर्थों का आकांक्षी होता है। इन पक्षों का ध्यान रखने पर बाबा साहब का अनुकरण करना हमारी जरूरत और मजबूरी हो जाती है।

उनकी 64वीं स्मृति दिवस के अवसर पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। जय भीम।

भारतीय गणतन्त्र में आने वाला समय डॉ. अंबेडकर और अंबेडकरवाद का है। समानता, स्वतन्त्रता व बंधुता पर आधारित समाज बनाना बहुत जरूरी है। बाबा साहब के इस नारे से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। वे एक महान व्यक्तित्व के धनी होने के साथ-साथ एक महान समाज सुधारक भी थे। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर देश समाज के नव निर्माण में सभी को योगदान देना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य इन तीनों शब्दों के अर्थों का आकांक्षी होता है। इन पक्षों का ध्यान रखने पर बाबा साहब का अनुकरण करना हमारी जरूरत और मजबूरी हो जाती है।

डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर की अद्वितीय प्रतिभा अनुकरणीय है । वे एक मनीषी, योद्धा, नायक, विद्वान, दार्शनिक, वैज्ञानिक, समाजसेवी एवं धैर्यवान व्यक्तित्व के धनी थे। खासकर भारत के 80 फीसदी दलित सामाजिक व आर्थिक तौर से अभिशप्त थे, उन्हें अभिशाप से मुक्ति दिलाना ही डॉ. अंबेडकर का जीवन संकल्प था। बाबा साहब का मानना था कि- वर्गहीन समाज गढ़ने से पहले समाज को जातिविहीन करना होगा। वहीं समाजवाद के बिना वंचित वर्ग की आर्थिक मुक्ति संभव नहीं।

डॉ. अंबेडकर का लक्ष्य था- ‘सामाजिक असमानता दूर करके दलितों के मानवाधिकार की प्रतिष्ठा करना’। ‘डॉ. अंबेडकर ने इस बाबत गंभीर लहजे में सावधान भी किया था, ’26 जनवरी 1950 को हम परस्पर विरोधी जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। हमारे राजनीतिक क्षेत्र में समानता रहेगी किंतु सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में असमानता रहेगी। जल्द से जल्द हमें इस परस्पर विरोधता को दूर करना होगी। वर्ना जो असमानता के शिकार होंगे, वे इस राजनीतिक गणतंत्र के ढांचे को उड़ा देंगे।’ बाबा साहब की ये चेतावनी आज सही होती दिखाई दे रही है। आज का समाज संक्रामण का समाज बन गया है। जिन समस्याओं की ओर बाबा साहब ने इंगित किया था वह आज गंभीर रूप धारण कर ली हैं।

डॉ. अम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है । स्वतंत्रता के बाद के भारत में उनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच को सम्मान हासिल हुआ । उनकी यह सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून और सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से प्रदर्शित होती है ।

वास्तव में डॉ. अंबेडकर सिर्फ दलित नेता नहीं थे। बल्कि सम्पूर्ण भारत के नेता थे – भारत के संविधान के निर्माता। सरकारी इश्तहारों और तथाकथित चिंतक उन्हें दलित नेता की प्रतिध्वनि के साथ इन्हें एक लौह आवरण में कैद करने की कोशिश करते दिखाई देते हैंं। सही मायनों में डॉ. अंबेडकर एक दलित नेता से भी ऊपर सच्चे देशभक्त व राजनीतिक युगपुरूष थे। उनके जीवन और मान्यताओं की प्रासंगिकता आज व्यापक फलक पर स्वयंसिद्ध है। इसलिए गांधी, लोहिया, दीनदयाल की तर्ज पर अंबेडकर के राजनीतिक, सामाजिक विचारों को उदारता के साथ सामाजिक-राजनीतिक जीवन में स्थापित करने की आवश्यकता है।

दलित-चिंतन के अलावा संसदीय राजनीति में नागरिक-समानता, राजनीतिक सिद्धान्त, अधिकार और कर्त्तव्य पर उनके विचार स्थायी महत्व के है। उस दौर में तमाम विदेशी ताकतें सक्रिय थी जो दलित, मुस्लिम का सवाल उठाकर भारत में विभाजन की विचारधारा को मिशनरी की आड़ में खड़ा करने में लगी थी। हिन्दू समाज से कड़वे अनुभवों के बावजूद विदेशी ताकतों के इन मंसूबों और पूर्वाग्रही दुष्प्रचार से वे सतर्क थे और अक्सर कहते थे कि वे इस देश से प्रेम करते है और वैश्विक छवि के मामले में वे कोई भी समझौता भारत की एकता, अखंडता, स्वाभिमान की कीमत पर नहीं कर सकते है।

भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन के 65 सालों में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, औद्योगिक, संवैधानिक आदि क्षेत्रों में अनगिनत कार्य करके राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कई ऐसे काम किए, जिन्हें आज भी पूरा देश याद रखता है। आज डॉ. अंबेडकर के विचारों को आत्मसात करने की आवश्यकता है। डॉ. अंबेडकर के कुछ विचार निम्नवत हैं –

  • “मुझे वह धर्म पसंद है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है।”
  • “मैं एक समुदाय की प्रगति को उस डिग्री से मापता हूं जो महिलाओं ने हासिल की है।”
  • “वे इतिहास नहीं बना सकते जो इतिहास को भूल जाते हैं।”
  • “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो ।”
  • “धर्म मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य धर्म के लिए।”
  • “मनुष्य नश्वर है, उसी तरह विचार भी नश्वर हैं। एक विचार को प्रचार-प्रसार की जरूरत होती है, जैसे कि एक पौधे को पानी की, नहीं तो दोनों मुरझाकर मर जाते हैं।”
  • “एक महान आदमी एक प्रतिष्ठित आदमी से इस तरह से अलग होता है कि वह समाज का नौकर बनने को तैयार रहता है।”
  • “समानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा।”
  • “बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।”
  • “मानता एक कल्पना हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे एक गवर्निंग सिद्धांत रूप में स्वीकार करना होगा।”

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