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ये कानून सम्पूर्णतः गलत हैं

जब सरकार कहती है कि वह किसानों की आलोचना के 14 या 15 बिंदुओं में से 12 में संशोधन करने को तैयार है, तो सरकार ने यह बात स्वीकार करती है है कि ये कानून सम्पूर्णत गलत है।

अदालत द्वारा मेरा नाम लिए जाने पर मुझे प्रसन्नता है- लेकिन यह तब मुद्दा बनता है जब सरकार वास्तव में इस विषय पर मुझसे संपर्क करती है|

यदि ऐसा होता है, तो मैं जानना चाहूंगा कि सरकार इस तरह के पैनल के प्रयोजन का क्या वास्तविक तर्क समझती है: इसका जनादेश क्या है, यह वास्तव में क्या देखेगी, इसकी संरचना क्या होगी – क्या यह वास्तव में किसी का प्रतिनिधत्व करेगी? इसकी स्थिति क्या है ( क्या सरकार इसके निष्कर्षों से बाध्य होगी ?)

मैं किसी मृत कमिटी का किसी रूप से भागीदार नहीं होना चाहुँगा ।

APMC या खेत अनुबंध कानूनों के ऑपरेटिव भाग – विशेष तौर से OPERATIVE भाग – मुश्किल से चार पृष्ठ का हैं।  जब सरकार कहती है कि वह किसानों की आलोचना के 14 या 15 बिंदुओं में से 12 में संशोधन करने को तैयार है, तो सरकार ने यह बात स्वीकार करती है है कि ये कानून सम्पूर्णत गलत है।  ऐसा लगता है कि इस तरह के त्रुटिपूर्ण दस्तावेज ( जिन्हें कई नामी वकीलों और कानून की समझ रखने वालों ने असंवैधानिक करार किया है) में 80-90 प्रतिशत संशोधन करने के लिए अयोग्य है।  क्या आप असंवैधानिक कानूनों में संशोधन कर सकते हैं – नहीं, आप उन्हें वापस ले लें।

अब तक का सबसे बड़ा पैनल खेती पर आधारित था, जिसने आने वाले दशकों के लिए भारतीय कृषि के लिए एक खाका बनाने के लिए सबसे अद्भुद दस्तावेज का उत्पादन किया था, स्वामीनाथन आयोग (या अधिक सटीक, राष्ट्रीय किसान आयोग)।  उस पैनल ने जिस तरह की विशेषज्ञता, प्रतिभा और समझ हासिल थी, वह अनुपम थी और इसने न केवल अपने शोध में, बल्कि व्यापक और बड़े पैमाने पर परामर्श के आधार पर काम किया। और फिर भी इसकी रिपोर्टें 16 साल से संसद में अछूती और अव्यवस्थित पड़ी हैं।  यह एक उत्कृष्ट कदम होगा यदि न्यायालय सरकार को संसद में चर्चा करने और रिपोर्ट को लागू करने के शीघ्र कार्यान्वयन की देखरेख के लिए एक पैनल गठित करने की सलाह देता ।

 2018 से, हम में से कुछ कह रहे हैं कि संकट कृषि कि समस्या से भी अधिक व्यापक और गंभीर है।  हमें कृषि संकट और संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने के लिए संसद के विशेष सत्र की आवश्यकता है।  मेरा मानना है कि इसकी जरूरत अब पहले से कहीं ज्यादा है।  और ध्यान दें कि  देश के किसान भी एक विशेष सत्र के लिए मांग कर रहे है।  अगर ऐसा होता है, तो मेरा मानना है कि भारत को हमारी संसद में एक प्रथा का उद्घाटन करना चाहिए, जो कुछ लोकतंत्रों की विधानसभाओं में काफी आम है – सार्वजनिक सुनवाई की प्रणाली।  जिन लोगों को संकट का सामना करना पड़ा है, उन्हें इस तरह की सार्वजनिक सुनवाई में संसद के मंच पर भी बोलने दें।

इन 3 कानून पर, मेरा मानना है कि किसानों को अपना निर्सान का अधिकार होना चाहिए।  हम में से कुछ ने उन्हें सुनवाई देने के लिए ध्यान दिया है।  आगे बढ़ते हुए, अगर वास्तव में कुछ ऐसे पैनल में मेरे आमंत्रित होने की स्थिति उत्पन्न होती है, तो मैं उन्हें फिर से सुनूंगा और फिर निर्णय लूंगा।

This article was originally published by P. Sainath in Trolley Times. 

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