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लोकडॉउन में जूझता किन्नर समाज

लॉकडाउन में समाज का हर तबका परेशान है लेकिन उन लोगों के पास कोई है जिससे वो अपनी समस्या को बता सकते हैं और मदद मांग सकते हैं लेकिन हमारे पास तो कोई नहीं है।

ट्रेन या बस में चढ़ते ही आप इनकी तालियों से इन्हें पहचान लेते हैं। कभी सिग्नल पर इनकी आवाज़ सुनते  हैं। और कभी किसी घर में बच्चे का जन्म हुआ हो, शादी हुई हो तो वे बधाई गाते, नाचते चले आते हैं। आप भी अपनी ख़ुशी, इच्छा और सामर्थ्य  से उन्हें बधाई दे देते हैं। इनके द्वारा दी गई बधाईयां को समाज अत्यंत शुभ मानता है। पर कोरोना के कारण ट्रांसजेंडर समुदाय इस समय भयानक आर्थिक संकट में हैं। 

भारत भर में तक़रीबन छह लाख लोग ट्रांसजेंडर समुदाय के हैं, जिन्हें आम भाषा में हम आप किन्नर भी कह देते हैं। आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े इस समुदाय को कोरोना की मार भी झेलनी पड़ रही है। डर, आशंका और असुरक्षा ने इनका मानसिक तनाव भी काफ़ी बढ़ाया है। इसी के चलते अनेक ट्रांसजेंडर द्वारा की गई आत्महत्याओं की ख़बरें भी हमें सुनने को मिलती हैं। क्योंकि यह लोग समाज से मदद की हर उम्मीद छोड़ चुके हैं। उचित दस्तावेज़ो और जानकारी के अभाव में यह लोग पिछड़े हुए हैं। इसकी वजह से इन्हें सरकारी मदद भी नहीं मिल पा रही है क्योंकि इन्हें पता ही नहीं है कि सरकार ने इनके लिए कौन सी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं।

ट्रेन और बसों में लोगों से पैसे मांगकर मांगकर, शादी-विवाह जैसे कार्यक्रमों में नाच गाकर अपना घर चलाने वाले ट्रांसजेंडर समुदाय के सामने अब रोज़ी-रोटी का संकट आ गया है। लॉकडाउन से जब आज हर कोई घरों में क़ैद है, दिहाड़ी पर काम करके खाने वाले लोगों के पास राशन नहीं है, ट्रांसजेंडर भी उन्हीं में शामिल हैं। महामारी से ट्रेन और बसें बंद हो गईं हैं, जो ट्रांसजेंडर ट्रेनों और बसों में मांगकर अपना जीवन चलाते थे उनके सामने भारी संकट आ गया है।

लॉकडाउन की वजह से सभी शादी और महोत्सव पर रोक लगा दी गयी है। ऐसे में इस समुदाय से जो लोग बधाई बजाकर और त्योहारों में मांगकर जीवन चलाते थे वो अब बेसहारा हो गये हैं। इनमें से कुछ लोग शहरों, क़स्बों आदि में बधाई गाने का काम करते हैं। जबकि ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा है, जो ट्रेनों और बसों में भीख मांगकर रोज़ी-रोटी कमाते हैं। ये रोज़ कमाते हैं, रोज़ खाते हैं। किसी तरह किराए पर कमरा लेकर समूह में रहते हैं। एक दिन न निकलें तो अगले दिन की रोटी के लिए सोचना पड़ता है। सबसे ज़्यादा बुरी हालत उनकी है जो गांव में नाच गाकर अपना गुज़ारा करते थे। क्योंकि गांव में हालात शहरों से भी अधिक बिगड़े हुए हैं। इन दिनों में इन तीनों ही वर्गों के किन्ननरों के लिए हालात बेहद चिंताजनक हो गए हैं।

 रोज़गार का कोई साधन न होने के कारण यह लोग अपना रोज़ का खाने तक का खर्च उठाने में समर्थ नहीं है। दस्तावेज़ों की कमी के कारण इन्हें सरकार की तरफ से मिलने वाली मदद भी नहीं मिल पा रही है। क्योंकि परिवार से अलग होते समय उनमें से अधिकतर अपना नाम और पता बदल लेते हैं या अपने दस्तावेज़ अपने साथ नहीं लेकर चलते। ऐसे में अधिकतर ट्रांसजेंडरों के पास ना राशन कार्ड है और न ही वोटर कार्ड। केवल कुछ ही ट्रांसजेंडर सरकार से मिलने वाले पैसे अपने बैंक खातों में प्राप्त कर रहे हैं। अन्य दस्तावेज़ रहित ट्रांसजेंडर लोगों को सरकार की इन सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

ऐसे अनेक ट्रांसजेंडर भी है जो रोज़ नौकरी करते थे और अपना खर्च चलाते थे। लेकिन इस महामारी के चलते सारे रोज़गार ठप पड़ गए हैं जिसकी वजह से इनसे इनका रोज़गार भी छिन गया। यह लोग अपने परिवार से दूर एक समूह में रहते हैं। अधिकतर ट्रांसजेंडरों के घर परिवार के लोग ने उन्हें बेदख़ल कर देते हैं । ऐसे में परिवार से सहायता की उम्मीद भी नहीं रहती। इनके पास टीवी मोबाइल आदि भी सबके पास नहीं होते। ऐसे में सरकार से मिलने वाली मदद की खबर इन लोगों तक पहुंच ही नहीं पाती है। जहां भी राशन मिलने या अन्य कोई मदद मिलने की खबर इनके पास पहुंचती है तो यह वहां मदद के लिए पहुंच जाते हैं। मगर वहां भी इन्हें अजीब नज़रों से देखा जाता है जो ठीक नहीं है।

महाराष्ट्र के ही मुम्बई में रहने वाली ट्रांसजेंडर माधुरी अपनी समस्या बताते हुए कहती हैं, “ट्रांसजेंडर समुदाय के ज्यादातर लोग ट्रेनों में मांगकर, शादियों में बधाई बजाकर अपना पेट पालते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सेक्स वर्क करके अपना और अपने परिवार का जीवन चलाते थे। लॉकडाउन में यह सब कुछ बंद चल रहा है। अब हम लोगों के सामने दिक्कत आ गयी है। अब न तो हम भीख मांग सकते हैं और न अपना खुद का कोई काम कर सकते हैं। जीना मुश्किल हो गया है।”

देश में ट्रांसजेंडर की संख्या 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 49 लाख है जबकि सरकार दस्तावेजों में रजिस्टर्ड ट्रांसजेंडर पांच लाख के करीब हैं।

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में रहने वाली देबी जिला कल्याण बोर्ड में संविदा पर नौकरी करती हैं। वो ट्रांसजेंडर समुदाय की समस्याओं को लेकर बहुत चिंतित हैं। देबी बताती हैं, “केंद्र सरकार की तरफ़ से हमारे समुदाय के कुछ लोगों को 1500 रुपए मिले हैं और कुछ राशन भी मिला है, लेकिन एक ट्रांसजेंडर के लिए इतने में जीवन बिता पाना संभव नहीं है।”

देबी के अनुसार यह पैसे और राशन भी उन्हीं लोगों को मिले हैं, जिनके पास कुछ कागज जैसे राशन कार्ड, बैंक अकाउंट और आधार कार्ड हैं। देबी खुद सवाल करती हैं कि आप बताइए कि ट्रांसजेंडर समुदाय में इन कागजों को लेकर कितनी जागरूकता है? ऐसे में मुझे लगता है कि लगभग 20 प्रतिशत से भी कम किन्नरों को इसका फायदा मिल पाया है।”

देबी आगे बताती हैं, “कोरोना महामारी के बाद जो हालात होने वाले हैं और भी खतरनाक होंगे। क्योंकि लॉकडाउन खुलने के बाद यदि हम किसी की घर बधाई मंगाते हैं और कुछ पैसों की डिमांड करते हैं तो सामने वाला भी यह कहेगा कि इतने दिनों से बंदी चल रही है कहां से पैसा लाएं। ट्रेन चलने के बाद वहां किसी भाई बन्धु से पैसा मांगते हैं तो वो भी कहां से देगा जो इतने दिनों से घर बैठा है। और फिर हमें अपनी जिंदगी भी तो बचानी हैं, ट्रेनों में सोशल डिस्टेंसिंग को कैसे बनाये रखा जा सकता है।”

झारखण्ड के जमशेदपुर से ट्रांसजेंडर अमरजीत सरकार से काफ़ी नाराज दिखते हैं अमरजीत एक पढ़े-लिखे ट्रांसजेंडर हैं। वो कहते हैं, “ट्रांसजेंडर के साथ शुरू से ही समस्या रही है, लेकिन लॉकडाउन का समय ट्रांसजेंडर के लिए बहुत ही खतरनाक है। हमारे लिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार की तरफ़ से कोई योजना नहीं है। सरकार हमारे तरफ़ तब ध्यान देती है जब चुनाव होता है। कुछ दिन पहले हमारे समुदाय के तीन लोग पास मांगने गये थे ताकि कुछ लोग बाहर निकलकर एक दूसरे की मदद कर सकें लेकिन हमें पास देने से भी मना कर दिया गया। अब जो सरकार हमें पास नहीं दे रही है वो हमें क्या मदद करेगी।”

वो आगे कहते हैं, “हम लोगों को अभी तक कोई भी राशन नहीं मिला है। न ही कोई आर्थिक मदद मिल पाई है। कुछ गैर सरकारी संगठन कुछ राशन की मदद किये हैं। लेकिन वो भी कितना मदद करेगें। हम लोगों का जीना मुश्किल हो गया। हमारे समुदाय के पास कोई रोजगार नहीं है, जब नई सरकार बनती है तो कहती है कि हम ट्रांसजेंडर को नौकरी देंगे लेकिन चुनाव के बाद सब भूल जाते हैं।”

कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन हुआ है। इस बंदी के चलते हर दिन कमाने-खाने वाले लोगों की मुश्किलें दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। ट्रांसजेंडर भी देश की एक बड़ी आबादी है जो रोज कमा खाकर अपना भरण-पोषण करती थी। समाज से दरकिनार किया हुआ ये समुदाय आपको खाने के लिए लगी किसी लाइन में भी नहीं दिखेगा क्योंकि लोग इन्हें ही घूरते रहते हैं।

दिल्ली से एक अन्य ट्रांसजेंडर रुद्रानी अपनी समस्या बताते हुए गंभीर हो जाती हैं। वो कहती हैं, “हमारे सामने ही समुदाय के लोग भूख से तड़प रहे हैं। अब आंखों से देखा नहीं जाता है। उनके लिए कोई मदद नहीं है। उनके पास इतना तक नहीं है कि कुछ दिन तक वो बिना काम किये अपना जीवन काट सकें।”

रुद्रानी ने किन्नर समुदाय की एक बड़ी समस्या के ऊपर ध्यान दिलाया, वो कहती हैं कि लॉकडाउन के इस दौर में हम लोगों को रहने की बड़ी समस्या है। लोग अब अपने घर से निकाल रहें हैं। जिस कमरे का किराया पांच हजार तक है मकान मालिक उसी कमरे का दाम आठ हजार मांग रहे हैं। पुलिस या किसी अधिकारी लोगों के पास जाने पर वो आईडी प्रूफ मांगते हैं। किन्नर समाज में बहुत से सदस्यों के पास कोई कागज नहीं है। अब हम कहां से यह लाकर दें। हमारे प्रधानमंत्री जी यह कहते हैं कि मकान मालिक अपने किरायदारों से किराया न लें लेकिन हम लोग तो क़ानूनी तौर पर किरायेदार ही नहीं रह गये हैं।”

वो कहती हैं कि लॉकडाउन खत्म होने के दो साल तक हमारे समुदाय के लोगों का जीवन पटरी पर नहीं आने वाला है। आज पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिति डगमगाने वाली है। अब जब लोगों के पास ही पर्याप्त नहीं रहेगा तो वो हमें कहां से देंगे। लॉकडाउन में समाज का हर तबका परेशान है लेकिन उन लोगों के पास कोई न कोई है जिससे वो अपनी समस्या को बता सकते हैं और मदद मांग सकते हैं लेकिन हमारे पास तो कोई नहीं है। किन्नर लोग अकेले जीवन जीते हैं वो किससे अपनी समस्या साझा करें।”

हालांकि सरकार अपनी तरफ से प्रत्येक समुदाय की सहायता करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं, मगर इस समुदाय की सहायता करने के लिए सरकार को धरातलीय स्तर पर और अधिक कार्य करने की आवश्यकता है। न केवल इस महामारी के काल के दौरान बल्कि इसके बाद भी इन लोगों को होने वाली समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए। ताकि यह समुदाय भी समाज में एक बराबर का स्थान प्राप्त कर सके।

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