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बिहार के भूजल में पाया गया यूरेनियम: रिपोर्ट 

माना गया है कि यूरेनियम के संपर्क में आने से कई प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभाव हो सकते हैं जैसे हड्डीयों की विषाक्तता के साथ साथ गुर्दे का कार्य का बिगाड़ना ।

बिहार के भूजल में पाया गया यूरेनियम: रिपोर्ट 

 

देश में कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कुछ स्थानीय क्षेत्रों में 30 माइक्रो ग्राम प्रति लीटर (विश्व स्वास्थ्य संगठन अनंतिम दिशानिर्देश अनुसार) से ऊपर यूरेनियम की मात्रा पाई गई है। बिहार भूजल में यूरेनियम संवर्धन सबसे ज्यादा मिला है। केंद्रीय भूजल बोर्ड और राज्य भूजल विभागों के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका के ड्यूक विश्वविद्यालय द्वारा एक रिपोर्ट तैयार की जो बताती है कि आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर में यूरेनियम सांद्रता का स्थानीयकरण हुआ है।  बिहार भूजल में यूरेनियम सबसे अधिक मात्रा में पाया गया है।

भारतीय मानक IS 10500: 2012 के लिए पीने के पानी के विनिर्देश ने अल्फा और बीटा उत्सर्जक के रूप में रेडियोधर्मी अवशेषों के लिए अधिकतम स्वीकार्य सीमा निर्दिष्ट की है। किसी भी अकेले रेडियोधर्मी तत्वों की विशेष रूप से पहचान नहीं की गई है।

इसके अलावा, भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा प्रदान की गई जानकारी के अनुसार, वे नियत प्रक्रिया का पालन करने के बाद सभी पेयजल मानकों में 0.03 मिलीग्राम / लीटर के रूप में यूरेनियम की अधिकतम अनुमेय सीमा को शामिल करने के लिए काम कर रहे हैं।जल राज्य मंत्री और सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री श्री रतन लाल कटारिया ने राज्य सभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी थी।

दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) के उपाध्यक्ष राघव चड्ढा ने हाल ही में कहा कि औद्योगिक प्रदूषकों के नदी में कम छोड़े जाने के कारण पानी की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। नदी के स्वास्थ्य में सुधार के बारे में कई रिपोर्टों ने सोशल मीडिया पर चौका दिया, लेकिन वे कितने विश्वसनीय हैं?यह अभी साबित नहीं हुआ है।

क्योंकि अगर देखा जाए तो उद्योगों द्वारा किया गया प्रदूषण  कुल प्रदूषण भार का केवल 10-20 प्रतिशत तक होता है । बाकी का प्रदूषण घरेलू कचरे से आता है, जिसमें कोई बड़ी गिरावट नहीं देखी है क्योंकि घरेलू कचरा तो अब भी उतना ही बन रहा है , बल्कि उसमें भी बढ़ोतरी देखी जा सकती है ।

इसका मतलब यह होता है कि केवल उद्योगों के बंद होने से यमुना में प्रदूषण के स्तर पर इतना बड़ा असर नहीं हो सकता है।यमुना में अब तक प्रदूषण पर लॉकडाउन के प्रभाव को मापने के लिए कोई वास्तविक समय या तुलनात्मक डेटा नहीं है।

सीपीसीबी के सदस्य सचिव प्रशांत गर्गवा ने बताया  “ऐसे अन्य कारक भी हैं जो जल प्रदूषण को दूर करने में मदद कर रहे हैं, जैसे ताजे पानी की रिहाई। डीजेबी नदी में कुछ पानी छोड़ रहा है, जिससे प्रदूषकों को पतला करने में मदद मिल सकती है। रिपोर्ट तैयार होने के बाद हम इसके बारे में और जानेंगे”।

घरेलू सीवेज केवल यमुना के लिए ही नहीं बल्कि गंगा के लिए भी प्रदूषण का मुख्य कारण है। नदी के किनारे स्थित 50 शहरों द्वारा हर दिन लगभग 2,723.30 मिलियन लीटर प्रति दिन कचरा उत्पन्न किया जाता है।सीपीसीबी के आंकड़ों के अनुसार, गंगा के साथ 36 निगरानी इकाइयों में से 27 में स्नान के लिए पानी फिट था। डेटा में पाया गया कि पानी कुछ स्थानों पर पीने के लिए भी उपयुक्त था जहां जैव रासायनिक ऑक्सीजन की मांग (बीओडी) 3 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम थी।हालांकि, सीपीसीबी के वास्तविक समय के आंकड़ों की अपनी सीमाएं हैं और पूरी रिपोर्ट की जानकारी नहीं दे सकती है।

इसके साथ ही पटना में, यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर, यूके और महावीर कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर, फुलवारीशरीफ द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में  बिहार के 10 जिलों (सुपौल, गोपालगंज, सीवान, सारण, पटना, नालंदा, नवादा, औरंगाबाद, गया और जहानाबाद) में भूजल को दूषित करने वाला यूरेनियम पाया गया है।शोधकर्ताओं को इस निष्कर्ष पर आने में डेढ़ साल लग गए। भूजल में यूरेनियम किस स्रोत के कारण फैल रहा है इसका का पता लगाना अभी बाकी है। 

अध्ययन के अनुसार “यूरेनियम सांद्रता ज्यादातर उत्तर पश्चिम-दक्षिण पूर्व घेरे के साथ और गंडक नदी के पूर्व में बढ रही है है और झारखंड की ओर गंगा नदी के दक्षिण में, विशेष रूप से गोपालगंज सिवान, सारण, पटना, नालंदा और नवादा जिलों में भी मिल रही है ”।

अध्ययन में यह भी कहा गया “सुपौल जिले में लिमिट से काफ़ी ऊपर यूरेनियम के नमूने भी मौजदू हैं। गंगा के दक्षिण और विशेष रूप से औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, नालंदा और नवादा के दक्षिण-पश्चिमी जिलों में यूरेनियम का स्तर लिमिट से अधिक पाया गया है जो बिहार में पिछले प्रावधानों के अनुरूप ही है ”।सुपौल में अधिकतम यूरेनियम सामग्री 80 लीटर यूरेनियम प्रति लीटर पानी थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार इसकी जायज़ सीमा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर है।  पटना में यह मात्रा सीमा से भी नीचे थी।

माना गया है कि यूरेनियम के संपर्क में आने से कई प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभाव हो सकते हैं जैसे हड्डीयों की विषाक्तता के साथ साथ गुर्दे का कार्य का बिगाड़ना ।परमाणु ऊर्जा विभाग से के अनुसार, पीने के पानी में बढ़ता हुआ यूरेनियम स्तर मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।दुनिया के अन्य हिस्सों में किए गए स्वास्थ्य अध्ययनों से पता चलता है कि पीने के पानी में बढ़ती यूरेनियम स्तर की मात्रा गुर्दे की समस्या को बढ़ाती है ।इसके अलावा, फिनलैंड में स्वास्थ्य प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करने वाले कई अध्ययनों को उन लोगों के बीच किया गया है जो अपने ड्रिल किए गए कुओं का उपयोग पानी पीने के स्रोतों के रूप में करते हैं जिनमें यूरेनियम की मात्रा 5.6 – 3410 पीपीबी मापी गई। हालांकि, उजागर आबादी के बीच इसके कोई स्पष्ट क्लीनिकल ​​लक्षण नहीं देखे गए हैं।

“यह पहली बार है कि भूजल में यूरेनियम सामग्री का पता चला है। यह बहुत खतरनाक है और कैंसर का कारण बन सकता है, ”शोधकर्ताओं में से एक, अशोक घोष ने इस बात का खुलासा किया। घोष, जो वर्तमान में बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष हैं, महावीर कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र, पटना में अनुसंधान के लिए विभाग के प्रमुख भी हैं।

घोष ने कहा, “लेकिन हमें भूजल में यूरेनियम के स्रोत का पता नहीं चला है क्योंकि कोरोनोवायरस प्रकोप ने हमारे अध्ययन में बाधा उत्पन्न की है।”उन्होंने बताया कि पानी में यूरेनियम की उपस्थिति वास्तव में बहुत आश्चर्यजनक थी। “अब तक, हम केवल जादुगुडा यूरेनियम खानों के बारे में जानते थे,” । ये  खदानें आज झारखंड में हैं, जो पहले बिहार का हिस्सा था।

साथ ही भूजल में आर्सेनिक के अध्ययन के लिए मानसून से पहले अनुसंधान टीमों ने पिछले साल राज्य भर में 273 स्थानों से नमूने एकत्र किए थे। लेकिन नमूनों के परीक्षण में कम से कम 10 जिलों में यूरेनियम पाया गया, घोष ने कहा। इन 10 जिलों में डब्ल्यूएचओ की निर्धारित सीमा से अधिक यूरेनियम की सांद्रता पाई गई।आर्सेनिक प्रदूषण लंबे समय से बिहार के विभिन्न जिलों में एक समस्या है और स्वास्थ्य के लिए भी खतरा भी है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, बिहार के भोजपुर जिले में पहली बार 2003 में आर्सेनिक की सूचना मिली थी। 2007 में 67,000 जल स्रोतों के बड़े पैमाने पर अध्ययन ने बेगूसराय, भागलपुर, भोजपुर ,बक्सर, कटिहार, खगड़िया, मुंगेर, पटना, समस्तीपुर, सारण और वैशाली सहित बिहार के 11 जिलों में बढ़ते हुए आर्सेनिक की सूचना दी। आज भी राज्य के इन  22 जिलों में आर्सेनिक की मात्रा पाई जाती है।

बिहार में आर्सेनिक के संपर्क के एक उभरते मार्ग के रूप में हाल ही में गेहूं की खपत की पहचान की गई है।एक रिपोर्ट के अनुसार बंगाल में आर्सेनिक संदूषण (26 मिलियन) के जोखिम वाले लोगों की अधिकतम संख्या के साथ बिहार (9 मिलियन), उत्तर प्रदेश (3 मिलियन), असम (1.2 मिलियन मिलियन), मणिपुर (1 मिलियन) और झारखंड (0.4 मिलियन)  अनुमानित जनसंख्या के साथ शामिल हैं ।

इन आंकड़ों को यदि गंभीरता से नहीं लिया गया तो यह समस्या एक बड़े संकट का रूप ले सकती है। क्योंकि पानी मनुष्य की एक मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है जिसके बिना जीवन संभव नहीं है। हालांकि लॉकडाउन के चलते पानी की गुणवत्ता में सुधार की ख़बरें सामने आ रही हैं लेकिन हम इस बात से मुंह नहीं मोड़ सकते कि एक बार लॉकडाउन खुलते ही और उद्योग शुरू होने के बाद जल प्रदूषण फिर से उसी गति से बल्कि उससे तेज गति से बढ़ेगा ।इसलिए आवश्यक है कि इस समस्या को लेकर संस्थाएं अनेक बेहतरीन तरीकों के साथ मिलकर सामने आएं और इस समस्या का समाधान करने का प्रयास करें। साथ ही ओद्यौगिक क्षेत्र तथा घरेलू क्षेत्र भी इस मामले में सहयोग करें।

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