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सरकार की क्या जरूरत है?

बलहीनों की रक्षा के लिए एक संगठित शक्ति की जरूरत होती है। इसी जरूरत के वशीभूत लोग एक सरकार का गठन करना चाहते हैं, उनकी चाहत होती हैं कि सरकार उनके हितों की उन बलशालियों से रक्षा करे।

किसी देश को या यूँ कहें कि लोगों को सरकार की क्या जरूरत है? सरकार का काम क्या है? लोग अपने जीवन की तमाम जरूरतें अपने आस पास के लोगों से पूरी कर लेते है। जैसे एक किसान अपने या बटाई या पट्टे पर लिए हुए खेतों में अनाज, और सब्जियां उगा कर अपनी खाने पीने की जरूरत को पूरा कर लेता है और जो उपज खाने की के खर्च से बच गयी (व्यवहार में, ज्यादातर बड़ी मुश्किल प्रयासों से पेट काट कर बचायी जाती है) उसे बाजार में बेंच कर नमक, मसाले, कपड़े या दूसरी अन्य जरूरी चीजें खरीद लेता है। मजदूर खेतों, कारखानों, दफ्तरों और दूसरे लोगों के घरों में श्रम कर पारिश्रमिक (मजदूरी, वेतन, सैलरी, तनख्वाह जो भी चाहे कहिये) लेता है और उससे बाजार से जरूरी चीजें खरीद लेता है। ये मजदूर दो तरह के हैं शारीरिक मजदूर और बौद्धिक मजदूर। व्यापारी बाजार और उत्पादकों से माल खरीदता और जरूरतमंद को बेच कर मुनाफा कमाता है। कारखाने का मालिक कारखाना लगाता है, मजदूरों से माल बनवाता है और व्यापारी को बेच कर अपना मुनाफा कमा लेता है। मास्टर छात्रों को पढ़ता है पढ़ाने की फीस लेकर अपनी जरूरत पूरी करता है। डाक्टर बीमारों का इलाज करता है, इलाज की फीस लेकर अपनी जरूरत पूरी करता है। आप को कहीं जाना होता है तो उस जगह जाने वाली गाड़ी, बस, जीप, टैक्सी या रिक्शा किया, उसका किराया चुकाया और चले गये। इसी तरह अनगिनत जरूरतें हो सकती हैं और वे जरूरतें पूरी भी होती हैं।

हमारा सारा जीवन इसी प्रकार चलता है। इस सब के बीच सरकार कहाँ आती है? जो भारी भरकम कर लेती है और कर भी इतना कि 1 रुपये की चीज पर कर लगाकर 600 से 700 रुपये की चीज में बदल दी जाती है,  एक पैसे के नमक को 12 रुपये में कौन बदलता है? ये सरकार। 25 पैसे मीटर कपड़े को 200 रुपये मीटर के कपड़े में कौन बदलता है? ये सरकार। रेल बस के एक पैसे के किराये को 50 रुपये में कौन बदलता है? ये सरकार। चौंकिए मत जनाब ये आंकड़े बिलकुल दुरुस्त हैं। इन सब चीजों जिनका यहाँ उदाहरण मैंने दिया है के दाम वाकई यही हैं और बाकी की रकम जो आप चुकाते हैं वो आप को इस लिए चुकाना होता है क्योंकि आप अपने सर पे सरकार नाम की एक चीज का बोझ उठाने को अभिशप्त हैं। ये सारी रकम इस सरकार को चुकाई गयी कर होती है। इसे चुकाने का अभिशाप आप ने अपने आप को दिया हुआ है।

आप कह सकते हैं कि इतना अधिक कर तो नहीं होता। 3 से 13 प्रतिशत वैट भर तो चीजों पर लगता है यानी 100 रुपये की चीज के 113 रुपये या 10 रुपये की चीज के 11 रुपये 13 पैसे देने पड़ते है इतना तो जायज है। किन्तु क्या आप जानते हैं कि इस देश ही नहीं किसी भी देश के पूंजीपति और अमीर लोग कोई भी कर नहीं देते! जो जितना ज्यादा अमीर होता जाता है उतना ही कम कर। और कर किस लिए? ताकि आप के सर पर सरकार नाम का आतंक स्वर रहे। महान आश्चर्य क्यों हुआ न? मैं क्या उल्टी बात कर रहा हूँ यही बात है न? लेकिन बन्धु ये दुनिया ऐसी ही उल्टी है और इसने आपकी अक्ल भी उल्टी कर रखी है अब चूंकि इस उल्टी दुनियां में आप औंधे मुह खड़े हुए हैं तो आप को कुछ भी उल्टा नजर नहीं आएगा बल्कि आपको वे लोग उलटे नजर आयेंगे जो सीधे खड़े हैं। सारे अमीरों के पास पूंजी है इस लिए काफी धन है जो इस पूंजीवादी समाज में शक्ति का एकमात्र श्रोत भी है और उत्पादक भी। हालाँकि दुनिया में समस्त संपदा और कौशल का वास्तविक श्रोत श्रम शारीरिक और मानसिक दोनों ही है और यह केवल श्रमिक वर्ग के पास है किन्तु वह पूंजी पति वर्ग आप से आप की समस्त शक्ति इस पूंजी की शक्ति की मदद से ठीक उसी प्रकार छीन लेता है जिस प्रकार रामायण का बाली सामने वाले योधा का बल छीन लेता था, लेकिन चूंकि इसके बावजूद बाली का वध किया गया, इस आधुनिक बाली का भी वध किया जा सकता है।

हाँ तो बात हो रही थी सरकार की जरूरत के बारे में, अगर सब कुछ नियम कायदे से उसी तरह चलता रहे जैसा ऊपर पहले गद्य में कहा गया है तो सरकार की क्या जरूरत है? जाहिर है कोई भी जरूरत नहीं है। लेकिन सभी वर्ग आधारित समाजों की तरह इस पूंजीवादी समाज में बहु संख्या शक्ति हीन होती है। जहाँ पूंजीपति और अमीर वर्ग अपनी शक्ति पूंजी का उपयोग कर बड़ी बड़ी सेनाएं रखता है जिसकी ताकत के इस्तेमाल से अपने लूट के अभियान चलता है और किसानों, श्रमिकों द्वारा पैदा की गयी समस्त संपदा को छल, बल, दमन, के हथियारों की बदौलत लूट कर अपनी तिजोरी में बन्द कर लेता है। वही बहुसंख्यक जन जो अपने श्रम के उत्पादों के उपभोग से वंचित कर दिए जाते हैं उनको जीवित रहने के लिए इन पूंजीपतियों की दया पर निर्भर होना पड़ता है। ऐसी स्थिति में इन बलहीनों की रक्षा के लिए एक संगठित शक्ति की जरूरत होती है। इसी जरूरत के वशीभूत लोग एक सरकार का गठन करना चाहते हैं, उनकी चाहत होती हैं कि सरकार उनके हितों की उन बलशालियों से रक्षा करे, जो सबकुछ अपनी तिजोरी में भर लेना चाहते हैं। सरकार के गठन का एकमात्र औचित्य बलहीनों के हितों की बलशालियों से रक्षा करने में है । ताकि समाज की सभी गतिविधियाँ सुचारू ढंग से चलती रहे और कोई गड़बड़ न पैदा हो। इसके लिए लोग सरकार का गठन करने को उद्यत होते हैं।

इस उद्देश्य से समज में एक सरकार का गठन होता है। इसके तमाम अंग उपांग उत्पन्न होते हैं, पुलिस, प्रशासन, न्याय विभाग, आदि अपना अस्तित्व और औचित्य प्राप्त करते हैं। समाज की तमाम सामूहिक गतिविधियों को सगठित और सुचारू रूप देने के लिए विभिन्न विभागों के रूप में सरकार के अंग अस्तित्व में आते हैं। स्वास्थ्य, परिवहन, शिक्षा, रेल, बिजली, आदि तमाम विभाग शुरू किये जाते हैं, ताकि बलहीन लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी की जा सकें। सरकार अपने अस्तित्व को कायम रखने और और विभागों को संचालित करने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए लोगों पर कर लगती है। लेकिन यह सबकुछ जल्दी ही लोगों के खिलाफ खड़ा हो जाता है। चूंकि सरकार शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत बन जाती है इस लिए इसपर शक्तिशालियों का दखल कायम हो जाता हैं।

 

जिस पुलिस का गठन लोगों की हिफाजत के लिए किया जाता है, वह लोगों के दमन का औजार बन जाती है, जिस न्यायलय का गठन लोगों को न्याय देने के लिए किया गया था वह फैसले बेचने की दुकान में बदल जाती है, उत्पादन से लेकर वितरण तक का तन्त्र शक्तिशाली वर्ग के हितसाधक यंत्र में बदल जाता है, चारों तरफ लूट, घूसखोरी, जालसाजी, दमन, उत्पीडन का बोलबाला हो जाता है। लोगों पर उनके द्वारा बने गया यह तंत्र एक भार बन जाता है, और लोग इस भार के जुए को अपने कंधे पर उठाये हुए इसको बनाये रखने के लिए कर चुकाते रहते हैं। व्यापारी और कारखानेदार जो कर चुकाते है पूरा का पूरा लोगों से वसूल करने के लिए इसे अपने द्वारा बेची जाने वाली चीजों के दामों में जोड़ देते हैं। और इस तरह वो वास्तव में कोई कर नहीं चुकाते बल्कि उनके हिस्से का कर भी मजदूर और श्रमिक ही चुकाते हैं। सरकार जन रक्षक, देश रक्षक के बजाय जन भक्षक, देश भक्षक बन जाती है। इसलिए देश के जनों का यह अधिकार ही नहीं बल्कि आवश्यक कर्तव्य बन जाता है कि ऐसी जन भक्षक देश भक्षक सरकार का समूल नाश कर दें।

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