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अभी ब्याहने की क्या जल्दी? (बाल विवाह)

यू एन की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में लगभग 13 मिलियन बाल विवाह के मामलों की पृष्टी हो सकती है। केवल कर्नाटक में ही 118 ऐसे मामले सामने आएं है।

मुझे याद है जब हम पांचवीं, छठी कक्षा में लेख लिखा करते थे कि कैसा होगा 2020 का भारत। जिसमें हम अपनी पूरी कल्पना के साथ भारत को हर क्षेत्र में सक्षम और यहां तक कि विश्व गुरु की उपाधि दे दिया करते थे। पर कल्पनाओं और केवल सकारात्मक सोच रखने से दुनिया नहीं चलती।

राजा राम मोहन रॉय के अथक प्रयासों के चलते बाल विवाह को हमारे समाज से बाहर फेंकने का काम शुरू हो गया था और 1929 में बाल विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पर कहते हैं की कुछ कुरीतियां मिट्टी में जड़े बनाए बैठ जाती है। मानवता पर कोरोना का कहर बरसा तो लगा  कि अब अपराध दर धीरे धीरे कम होता नजर आ रहा है, वहीं हम नजरअंदाज कर बैठे ऐसे अपराध जिन्हें करने के लिए घर से भी बाहर निकलने की आवश्यकता नहीं होती।

पहले घरेलू हिंसा की ख़बरें तो फिर पता चला कि यह महामारी हमारे समाज की कुछ कुप्रथाएं वापिस लाने लगी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह होने शुरू हो गए। असलियत यह भी है कि ऐसे विवाह होने कभी बन्द ही नहीं हुए थे परन्तु इस लॉकडाउन की वजह से ऐसे मामले बढ़ते ही चले जा रहे हैं।

खबर यह है कि कर्नाटक में सबसे ज़्यादा बाल विवाह हो रहे हैं,और अच्छी खबर यह भी है कि कहीं हद तक इन्हे रोका भी गया है।

चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी को एक हफ्ते में ही लगभग 37 फोन आए जो बाल विवाह रिपोर्ट करने के लिए थे, वहीं 32 फोन शारीरिक शोषण के मामले थे

स्कूल एक बहुत बड़ा कारण था ,लड़कियों को इन शादियों से दूर रखने का। लेकिन कोविड महामारी के फैलने के बाद स्कूल बन्द होने की वजह से लड़कियों को जबरन शादी में धकेला जा रहा है।

और तो और यू एन की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में लगभग 13 मिलियन बाल विवाह के मामलों की पृष्टी हो सकती है।

केवल कर्नाटक में ही 118 ऐसे मामले सामने आएं है। अपनी बेटी, अपना धन और सारदा जैसी योजनाएं अपने स्तर पर काम कर रहीं है लेकिन ऐसी कुरीतियां तभी रुकेंगी जब लोग स्वयं एहसास करेंगे।

पर मजबूर तो ऐसे परिवार भी है,जो ना चाहते हुए भी यह करने को आतुर हैं।

परिवारों में महामारी के कारण होने वाली गरीबी और वित्तीय बोझ डलने की वजह से भी संभावना है कि, यह बाल विवाह के मामले बढ़ते जा रहे हैं।

कोविड से पहले शादियों पर ज़्यादा खर्चा होने की वजह से कुछ परिवार तो इस लॉकडाउन के चलते ही लड़कियों को घर से विदा करना चाहते हैं ताकि विवाह पर ज़्यादा खर्चा ना करना पड़े। बात यहीं खत्म नहीं होती, बाल विवाह की वजह से लड़कियों को अपने से अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ शादी करनी पड़ती है।

छोटी उम्र की लड़कियों को गर्भधारण करना पड़ता है जिसकी वजह से अर्ली मेटर्नल डैथ ( मातृ मृत्यु) हो जाना, शिशु के पैदा होते ही उसकी मौत हो जाना और सब से बड़ी बात इन छोटी छोटी बच्चियों को घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है।

यह लड़कियां जो दुल्हनें बनने की लिए तत्पर नहीं होती उन्हें डिप्रेशन, अवसाद और कई प्रकार की समस्याओं से अकेले ही झूझना पड़ता है।

बात चाहे महामारी की हो, किसी जगह पर सूखा पड़ने की हो या युद्ध के फलस्वरूप, भुगतना लड़कियों को ही पड़ता है। किसी ने सही ही कहा है, यह महामारी हमारी प्रणाली की विफलता, लोगों की सहिष्णुता शक्ति और समाज किस प्रकार से लड़कियों को देखता है, यह सब सामने ला रही है।

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